सांची की सौर योजना में बड़ी लापरवाही ? 10 फीट नीचे गिरी लोहे की जाली, करोड़ों की परियोजना पर उठे सवाल

📰 आर्टिकल |नसीम खान |Live khabar india

सौर ऊर्जा की प्याऊ में ‘दरार’! 10 फीट नीचे गिरी लोहे की जाली, करोड़ों की योजना पर उठे सवाल

सांची। देश-दुनिया में बौद्ध विरासत और पर्यटन के लिए पहचान रखने वाली सांची को सौर ऊर्जा से जगमगाने और आधुनिक सुविधाओं से लैस करने की योजनाएं भले ही कागजों पर आकर्षक नजर आती हों, लेकिन जमीन पर इनकी तस्वीर अब सवाल खड़े कर रही है। सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाई गई सौर ऊर्जा संचालित प्याऊ की भारी लोहे की जाली अचानक करीब 10 फीट नीचे गिर गई।

गनीमत रही कि जिस वक्त जाली भरभरा कर नीचे गिरी, उस समय उसके आसपास कोई मौजूद नहीं था। अगर यह हादसा किसी व्यक्ति या पर्यटक की मौजूदगी में होता तो स्थिति गंभीर हो सकती थी।

घटना ने न सिर्फ निर्माण की गुणवत्ता, बल्कि सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

चालू प्याऊ, लेकिन ऊपर से गिर गई जाली

जानकारी के मुताबिक सांची नगर में नागरिकों के साथ देशी-विदेशी पर्यटकों को पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अलग-अलग स्थानों पर सौर ऊर्जा से संचालित प्याऊ स्थापित की गई थीं। इनमें से कुछ प्याऊ के बंद पड़े होने की बात सामने आ रही है।

वहीं बस स्टैंड क्षेत्र में स्थित प्याऊ चालू होने के बावजूद इसकी स्थिति व्यवस्था की कहानी कहती नजर आ रही है। प्याऊ के ऊपर लगी भारी लोहे की जाली अचानक नीचे गिर गई।

सवाल यह है कि जिस ढांचे का निर्माण सार्वजनिक उपयोग और लोगों की सुविधा के लिए किया गया था, उसकी मजबूती और सुरक्षा की जांच कितनी गंभीरता से की गई?

निर्माण के समय गुणवत्ता जांच हुई या सिर्फ खानापूर्ति?

जाली का इस तरह अचानक गिरना सबसे बड़ा सवाल निर्माण की गुणवत्ता को लेकर खड़ा करता है।

क्या निर्माण के समय इस्तेमाल की गई सामग्री की गुणवत्ता की जांच की गई थी?
क्या जाली को निर्धारित मानकों के अनुसार लगाया गया था?
निर्माण पूरा होने के बाद इसकी सुरक्षा और मजबूती का निरीक्षण किया गया या नहीं?

इन सवालों के जवाब जिम्मेदार अधिकारियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। फिलहाल घटना ने पूरी व्यवस्था की निगरानी पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

करोड़ों की सौर योजना, फिर भी कई जगह अंधेरा

सांची को सौर ऊर्जा से जगमगाने की योजना सिर्फ प्याऊ तक सीमित नहीं है। नगर में सौर ऊर्जा आधारित स्ट्रीट लाइट और अन्य सुविधाएं भी विकसित की गई हैं।

लेकिन स्थानीय स्तर पर कई जगह इन व्यवस्थाओं की बदहाल स्थिति दिखाई देने की बात सामने आ रही है। कहीं सौर खंभे गायब बताए जा रहे हैं तो कहीं सोलर प्लेटें नजर नहीं आतीं। जिन स्थानों को सौर ऊर्जा के जरिए रोशन करने का लक्ष्य रखा गया था, वहां कई जगह अंधेरा दिखाई देना पूरी योजना के रखरखाव पर सवाल खड़े करता है।

नागौरी पहाड़ी पर सौर प्लांट, फिर व्यवस्था क्यों बदहाल?

सांची को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आदर्श शहर बनाने के उद्देश्य से नागौरी पहाड़ी पर सौर ऊर्जा प्लांट भी स्थापित किया गया है। ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब सौर ऊर्जा के लिए बड़े स्तर पर infrastructure तैयार किया गया है, तो सार्वजनिक सुविधाओं की नियमित देखरेख क्यों नहीं हो पा रही?

प्याऊ की जाली गिरने की घटना को इसी व्यापक व्यवस्था के संदर्भ में देखा जा रहा है।

पर्यटक शहर की सुविधाओं पर भी असर

सांची में देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। ऐसे में सार्वजनिक सुविधाओं की मजबूती और रखरखाव केवल स्थानीय लोगों का मुद्दा नहीं, बल्कि शहर की पर्यटन छवि से भी जुड़ा है।

एक तरफ सांची को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक सुविधा की जाली का दस फीट नीचे गिर जाना व्यवस्था के दावों के बीच बड़ा विरोधाभास पैदा करता है।

अब जरूरत सिर्फ मरम्मत की नहीं, जांच की भी

नगरवासियों की मांग है कि सांची में स्थापित सभी सौर ऊर्जा आधारित प्याऊ, सोलर लाइट और संबंधित infrastructure का व्यापक निरीक्षण कराया जाए।

साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि निर्माण के दौरान निर्धारित गुणवत्ता मानकों का पालन हुआ था या नहीं और इन परिसंपत्तियों के रखरखाव की जिम्मेदारी किस विभाग या एजेंसी की है।

अगर किसी निर्माण में तकनीकी कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए।

बड़ा सवाल: सौर सिटी का सपना या फाइलों की रोशनी?

सांची को सौर ऊर्जा से आत्मनिर्भर और रोशन बनाने का सपना बड़ा है। लेकिन करीब दस फीट नीचे गिरी एक लोहे की जाली ने इस सपने की जमीनी हकीकत पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इस घटना को महज एक टूट-फूट मानकर जाली की मरम्मत तक सीमित रहता है या फिर पूरे सौर ऊर्जा infrastructure की गुणवत्ता, सुरक्षा, खर्च और रखरखाव की विस्तृत जांच कराई जाती है।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक जाली के गिरने का नहीं है—
सवाल यह है कि करोड़ों की सौर योजना आखिर सांची को रोशनी दे रही है या उसकी चमक सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित है?

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