नसीम खान
सांची,,,ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक धरोहरों को अपने भीतर समेटे सांची की पहचान विश्वभर में है। यहां ढाई हजार वर्ष पुराने स्मारकों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने के लिए शासन स्तर पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसी क्षेत्र में कई ऐसी पुरातात्विक धरोहरें भी मौजूद हैं, जो संरक्षण और सुरक्षा के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होने की कगार पर पहुंच रही हैं। इनकी ओर न तो प्रशासन का पर्याप्त ध्यान दिखाई देता है और न ही संबंधित पुरातत्व विभाग की सक्रियता नजर आती है।
सांची को भगवान बुद्ध के परम शिष्यों महामोदग्लायन एवं सारिपुत्र की पवित्र अस्थियों तथा प्राचीन स्तूपों और स्मारकों के कारण बौद्ध समुदाय के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में विश्वभर में पहचान मिली है। एक ओर इन महत्वपूर्ण धरोहरों को सुरक्षित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सांची के आसपास के क्षेत्र में आज भी अनेक प्राचीन पुरासंपदाओं के चिन्ह बिखरे पड़े हैं, जो संरक्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
नागौरी की पहाड़ी बयां करती है पुरातन विरासत की कहानी
इसी उपेक्षित पुरासंपदा की कहानी नागौरी की पहाड़ी भी बयां करती है। पहाड़ी क्षेत्र में बड़ी-बड़ी चट्टानों का जाल बिछा हुआ है और इन चट्टानों पर बड़ी संख्या में प्राचीन शैलचित्र उकेरे हुए बताए जाते हैं। हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी इन चट्टानों पर मौजूद आकृतियां आज भी अपने समय की कला और जीवनशैली के प्रमाण के रूप में दिखाई देती हैं।
इन शैलचित्रों के संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की है, लेकिन इनके संरक्षण की दिशा में प्रभावी प्रयास दिखाई नहीं देते। इसके बावजूद आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने इन चट्टानों और शैलचित्रों को अपने पूर्वजों की विरासत मानकर उनकी यथास्थिति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ग्रामीण आज भी इन ऐतिहासिक निशानियों की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।
विडंबना यह है कि जिन पुरासंपदाओं को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने की जिम्मेदारी शासन ने संबंधित विभागों को सौंपी है, उनकी सुरक्षा का दायित्व स्थानीय ग्रामीणों को उठाना पड़ रहा है। ऐसा भी नहीं है कि जिम्मेदार विभाग इन प्राचीन धरोहरों से पूरी तरह अनजान हैं, बावजूद इसके संरक्षण के ठोस प्रयासों का अभाव सवाल खड़े करता है।
अब देखना यह है कि हजारों वर्ष पुरानी इन चट्टानी शैलचित्रों की ओर शासन-प्रशासन और संबंधित पुरातत्व विभाग कब ध्यान देता है और इन्हें संरक्षण प्रदान करने के लिए ठोस पहल करता है, या फिर यह ऐतिहासिक विरासत भी समय के साथ उपेक्षा की भेंट चढ़ती रहेगी।





