नसीम खान
सांची,,,इन दिनों खेतों में धान की कटाई के बाद पराली जलाने के मामले सामने आ रहे हैं। इससे खेतों की मिट्टी की उर्वरक क्षमता प्रभावित होने के साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है। इसको लेकर कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने किसानों से पराली नहीं जलाने तथा उसके उचित प्रबंधन की अपील की है।
जानकारी के अनुसार, पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए जिला प्रशासन लगातार दिशा-निर्देश जारी कर रहा है। वहीं कृषि विभाग के परियोजना संचालक रवि आम्रवंशी, सांची के वरिष्ठ कृषि अधिकारी घनश्याम मालवीय एवं वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी सीएल अहिरवार ने किसानों से धान की फसल कटाई के बाद खेतों में पराली नहीं जलाने की अपील की है। अधिकारियों ने कहा कि पराली में आग लगाने की प्रवृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाना जरूरी है। इसके लिए किसानों को जागरूक होकर पराली के उचित प्रबंधन के विकल्प अपनाने होंगे।
अधिकारियों के अनुसार, पिछले खरीफ सीजन में जिलेभर में पराली जलाने के 752 मामले सामने आए थे, जबकि इस वर्ष भी अब तक लगभग 21 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
उन्होंने बताया कि रायसेन जिला कृषि प्रधान है। यहां खरीफ सीजन में लगभग तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है, जिसमें करीब ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बासमती धान का उत्पादन होता है, जो कुल धान क्षेत्र का लगभग 80 प्रतिशत है। चावल की गुणवत्ता बनाए रखने और किसानों को उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के उद्देश्य से धान की कटाई मजदूरों के माध्यम से कराई जाती है। इसके बाद धान की गहाई थ्रेसर से की जाती है। गहाई के बाद खेतों में जगह-जगह भूसे के ढेर एकत्रित हो जाते हैं, जिन्हें कई बार शाम होते ही आग के हवाले कर दिया जाता है।
अधिकारियों ने बताया कि पराली, भूसा और नरवाई जलाने से खेतों की मिट्टी की उर्वरता लगातार कम होती है। इससे मिट्टी कठोर होने के साथ उसकी जल धारण क्षमता घटती है तथा मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी की प्राकृतिक संरचना भी प्रभावित होती है। खरीफ में सोयाबीन, रबी में गेहूं तथा मूंग की फसल के बाद अवशेषों में आग लगाने की प्रवृत्ति भी खेतों की सेहत के लिए नुकसानदायक है। यदि वर्ष में बार-बार खेतों में आग लगाई जाती है तो इसका सीधा असर भूमि की उपजाऊ क्षमता पर पड़ता है।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि खेतों की उर्वरता बनाए रखने के लिए प्राकृतिक खाद का संतुलित उपयोग करें, कीटनाशक दवाओं का कम से कम इस्तेमाल करें तथा पराली, भूसा और नरवाई का उचित प्रबंधन अपनाएं। इसके लिए बेलर मशीन का उपयोग कर फसल अवशेषों की गांठें बनाई जा सकती हैं, जिनका उपयोग पशुओं के चारे, पैकेजिंग सामग्री, खाद निर्माण तथा ईंट भट्ठों सहित अन्य कार्यों में किया जा सकता है।
कृषि विभाग द्वारा इस दिशा में किसानों को जागरूक करने के लिए पंचायत स्तर पर तथा चौपाल कार्यक्रमों के माध्यम से समझाइश देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
खेतों की मिट्टी बचाना ही आने वाली पीढ़ियों की खेती और खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।





