वन अधिकार पट्टे ने बदली रूपबसंत की जिंदगीसाहूकारों पर निर्भरता खत्म, खेती से बढ़ी आय; परिवार के जीवन स्तर में आया बदलाव

नसीम खान
सांची,, वर्षों से जिस जमीन पर खेती कर परिवार का गुजर-बसर करने वाले ग्राम रतनपुर निवासी रूपबसंत आदिवासी के जीवन में वन अधिकार पट्टा मिलने के बाद बड़ा बदलाव आया है। कभी खेती के लिए बीज, खाद और अन्य जरूरतों के लिए साहूकारों से ब्याज पर राशि लेने को मजबूर रूपबसंत अब बैंकिंग सुविधाओं और शासकीय योजनाओं का लाभ लेते हुए अपनी खेती को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
रूपबसंत आदिवासी पिता रतनलाल आदिवासी बताते हैं कि उनके पिता वर्ष 1965 से ग्राम रतनपुर में निवास करते हुए कब्जे की भूमि पर खेती करने के साथ मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मिट्टी की दीवार और कवेलू की छत वाले कच्चे मकान में रहना पड़ता था। बारिश के दिनों में छत से पानी टपकने पर पन्नी डालकर परिवार को गुजारा करना पड़ता था।
विवाह के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो रूपबसंत और उनकी पत्नी ने भी खेती के साथ मजदूरी करना शुरू कर दिया। भूमि का अधिकृत पट्टा नहीं होने के कारण शासकीय योजनाओं और बैंकिंग सुविधाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता था। खेती के लिए बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने से लेकर बच्चों की पढ़ाई, कपड़े और त्योहारों की जरूरतों तक के लिए साहूकारों से उधार लेना पड़ता था। फसल आने पर ब्याज सहित कर्ज चुकाने के बाद परिवार के पास बहुत कम राशि बचती थी।
वनमित्र पोर्टल से मिला भूमि अधिकार
वर्ष 2019-20 में रूपबसंत को जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित एमपी वनमित्र पोर्टल के माध्यम से वन अधिकार पट्टे के लिए आवेदन करने की जानकारी मिली। उन्होंने विभागीय कार्यालय पहुंचकर ऑनलाइन आवेदन किया। पात्रता परीक्षण के बाद वर्ष 2020-21 में उन्हें 0.325200 हेक्टेयर कृषि भूमि का वन अधिकार पट्टा जारी किया गया।
रूपबसंत कहते हैं कि पट्टा मिलना उनके परिवार के लिए नई शुरुआत जैसा था। उनके अनुसार, “पट्टा मिलने के बाद मुझे लगा कि अब मैं भी मजदूर से कृषक बन गया हूं। अपनी भूमि पर अधिकार मिलने से परिवार में नई उम्मीद आई।”
पट्टा मिलने के बाद बैंक और शासकीय योजनाओं से जुड़े
वन अधिकार पट्टा मिलने के बाद रूपबसंत ने बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के लिए आवेदन किया। वर्ष 2025 में उन्हें केसीसी जारी हुआ, जिसके माध्यम से खेती के लिए बीज, खाद सहित अन्य आवश्यकताओं हेतु कम ब्याज दर पर ऋण की सुविधा मिली। मवेशी खरीदने के लिए भी कृषि ऋण स्वीकृत हुआ।
इसके साथ ही उन्होंने किसान सम्मान निधि के लिए आवेदन किया, जिसके तहत उन्हें प्रतिवर्ष 6 हजार रुपये की आर्थिक सहायता मिल रही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का लाभ भी उन्हें मिला है। कृषि यंत्र सब्सिडी योजना के माध्यम से वे ट्रैक्टर खरीदने की योजना बना रहे हैं। बैंकिंग सुविधाओं से व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलने से परिवार को आर्थिक सुरक्षा भी मिली है।
अब साहूकार नहीं, अपनी खेती पर भरोसा
रूपबसंत बताते हैं कि वन अधिकार पट्टा मिलने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में बदलाव आया है। पहले खेती की जरूरतों के लिए भी साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब बैंक से कृषि ऋण और विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ मिलने से खेती में निवेश करना आसान हुआ है। बच्चों की पढ़ाई बेहतर स्कूल में हो रही है और परिवार पक्का मकान भी बनवा रहा है।
वे कहते हैं, “पहले खेती करने के साथ मजदूरी भी करनी पड़ती थी और साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता था। अब अपनी भूमि पर अधिकार है। बैंक से कृषि ऋण और शासन की योजनाओं का लाभ मिल रहा है। अब मैं साहूकारों पर निर्भर नहीं हूं, बल्कि अपनी खेती पर भरोसा कर परिवार चला रहा हूं।”
वन अधिकार पट्टे ने रूपबसंत के परिवार को केवल जमीन पर अधिकार ही नहीं दिया, बल्कि बैंकिंग सुविधाओं और कृषि योजनाओं से जुड़ने का अवसर भी दिया। इससे परिवार खेती को आय का मजबूत आधार बनाकर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है।

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