MP UCC Controversy: ग्यारसपुर में UCC के विरोध में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन, मुस्लिम समाज और संगठनों ने उठाए गंभीर सवाल

रिपोर्ट : आसिफ खान |Live Khabar india

विदिशा: ग्यारसपुर (मध्य प्रदेश): राज्य में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) को लेकर सामाजिक और धार्मिक स्तर पर विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ग्यारसपुर में मुस्लिम समाज, जमीयत उलेमा मध्य प्रदेश और विभिन्न नागरिक संगठनों की ओर से भारत की राष्ट्रपति के नाम एक औपचारिक अभ्यावेदन सौंपा गया है। इस ज्ञापन के माध्यम से यूसीसी के प्रस्तावित प्रावधानों पर संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोणीय आधारों पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है।

अभ्यावेदन सौंपने पहुंचे प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि उनका यह कदम किसी धर्म या समुदाय विशेष के विरोध में नहीं है, बल्कि देश की मूल संवैधानिक भावना, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए उठाया गया है।

संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा की मांग
अभ्यावेदन में भारत की बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक पहचान का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारतीय संविधान हर नागरिक को अपनी धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और उनका पालन करने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 44 बनाम मौलिक अधिकार: ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति-निर्देशक तत्व) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति-निर्देशक तत्व अदालतों द्वारा बाध्यकारी (प्रवर्तनीय) नहीं हैं। इसलिए, यूसीसी लागू करने के प्रयास में नागरिकों के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का हनन नहीं होना चाहिए।

ज्ञापन देते हुए

धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी: प्रतिनिधियों ने संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 का हवाला देते हुए कहा कि ये प्रावधान सभी वर्गों को धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की स्पष्ट सुरक्षा प्रदान करते हैं।

शरीयत और मुस्लिम पर्सनल लॉ का पक्ष
मुस्लिम समाज की ओर से तर्क दिया गया कि विवाह, निकाह, तलाक, विरासत, वसीयत और पारिवारिक मामलों में शरीयत पर आधारित पर्सनल लॉ केवल कानून नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। इसमें किसी भी तरह का सरकारी या कानूनी हस्तक्षेप धार्मिक मान्यताओं पर प्रभाव डालता है।

छूट के दोहरे मापदंड पर उठाए सवाल

ज्ञापन में एक प्रमुख व्यावहारिक और कानूनी सवाल यह उठाया गया कि यदि यूसीसी के तहत देश की अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य विशेष सामाजिक समूहों को उनकी सदियों पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों के आधार पर छूट दी जा सकती है, तो यही मानक मुस्लिम समाज और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ पर लागू क्यों नहीं किया जा सकता?

विधि आयोग की रिपोर्ट और पारदर्शिता की मांग
ज्ञापन में 21वें भारतीय विधि आयोग (21st Law Commission) की वर्ष 2018 की उस परामर्श रिपोर्ट (Consultation Paper) का विशेष रूप से उल्लेख किया गया, जिसमें आयोग ने स्पष्ट कहा था कि “इस चरण में समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय।”

प्रतिनिधियों ने मांग की है कि:
यूसीसी थोपने के बजाय विभिन्न पर्सनल लॉ के भीतर मौजूद कमियों में सुधार (Reform within Personal Laws) का विकल्प अपनाया जाए।
मध्य प्रदेश सरकार यूसीसी लागू करने की अपनी नीति के कारणों और उद्देश्यों को जनता के सामने पूरी तरह सार्वजनिक और पारदर्शी बनाए।

निष्कर्ष

ग्यारसपुर में सौंपा गया यह अभ्यावेदन इस बात का संकेत है कि यूसीसी का मुद्दा केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह जमीनी स्तर पर भी बहस का मुख्य केंद्र बन चुका है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने उम्मीद जताई है कि राष्ट्रपति भवन इस अभ्यावेदन पर संज्ञान लेते हुए देश के सामाजिक ताने-बाने और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।

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