सांची की नलजल योजना बनी उदासीनता की मिसाल, गर्मी में गहराया जलसंकट

नसीमखान
करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं मिल रहा समाधान, निर्माण की कछुआ चाल पर अधिकारी बेपरवाह।
सांची ,,वर्षों से निर्माणाधीन नलजल योजना अब नगरवासियों के लिए उम्मीद की जगह निराशा का कारण बन गई है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा ऐतिहासिक स्थल सांची में जलापूर्ति संकट को दूर करने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से स्वीकृत इस योजना का निर्माण कार्य मप्र अर्बन डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड को सौंपा गया था। परंतु वर्षों बीत जाने के बावजूद योजना अभी तक धरातल पर नहीं उतर सकी।
नगरीय सेवाओं के उन्नयन कार्यक्रम के अंतर्गत स्वीकृत यह योजना अब चर्चाओं का केंद्र बन चुकी है, लेकिन निर्माण की गति इतनी धीमी है कि स्थानीय प्रशासन से लेकर आम जनता तक, सभी परेशान हैं। गर्मी ने अपना प्रचंड रूप दिखाना शुरू कर दिया है और जल स्रोतों का स्तर लगातार घट रहा है, जिससे नगर में जलसंकट गहराता जा रहा है।
जनता को उम्मीद थी कि गर्मी शुरू होने से पूर्व यह योजना शुरू हो जाएगी, लेकिन निर्माण कार्य की रफ्तार न के बराबर रही। नगर में यह भी चर्चा जोरों पर है कि इस योजना की राशि में व्यापक गड़बड़ियाँ हुई हैं और इसका असर सीधे तौर पर निर्माण की धीमी प्रगति में देखा जा सकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस योजना के तहत किए गए खुदाई कार्यों के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग गड्ढों में तब्दील हो गया है, और फिर भी राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। इससे करोड़ों की लागत से बनी सड़कें बरबाद हो गईं और सरकारी धन की बर्बादी अब जनता में चर्चा का विषय बन चुकी है।
नगर परिषद अध्यक्ष पप्पू रेवाराम ने इस उदासीनता पर नाराजगी जाहिर करते हुए भोपाल में वरिष्ठ अधिकारी आनंद सिंह से मुलाकात की और निर्माण की धीमी गति से अवगत कराया। वरिष्ठ अधिकारी ने इस विषय को गंभीरता से लेते हुए कंपनी अधिकारियों को फटकार लगाई और कार्य शीघ्र पूरा करने के निर्देश दिए।
हालांकि, दो सप्ताह बीतने के बावजूद भी जमीनी स्थिति जस की तस है। निर्माण कार्य में तेजी लाने के कोई संकेत नहीं मिल रहे और अब यह संदेह गहराने लगा है कि क्या यह योजना आगामी छह माह में भी पूरी हो सकेगी।
जलसंकट से जूझते नगरवासियों की समस्याओं को देखते हुए अब नगर परिषद प्रशासन ने वैकल्पिक उपाय के तौर पर नए ट्यूबवेल खुदवाने शुरू कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी समाधान न मिले, तो ऐसी योजनाओं की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?

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