गेहूं और दालों की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने स्टॉक बताना आवश्यक

वसीम कुरैशी रिपोर्टर
रायसेन।गेहूं के मनमाने दाम नहीं बढ़ सके इसके लिए सरकार लगातार प्रयासरत है। हाल ही में सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कालाबाजारी को रोकने के लिए खाद्य पदार्थों की स्टाक सीमाएं और स्टाक के लिए नए दिशा निर्देश जारी किए हैं। आटा और दालों की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए गेहूं और दाल की ट्रेडिंग करने वालों के लिए स्टॉक के बारे में बताना अनिवार्य कर दिया है। पिछले कई दिनों से आटा, चावल और दाल की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है। भारतीय खाद्य निगम ने खुले बाजार बिक्री योजना के तहत की जाने वाली साप्ताहिक ई-नीलामी की प्रक्रिया में गेहूं व्यापारियों को इसमें भाग लेने से इंकार कर दिया है।
कृषि उपज मंडी सूत्रों ने बताया कि सरकार की मंशा गेहूं और उससे बनने वाले उत्पादों पर महंगाई पर लगाम लगाना है। दरअसल, कुछ मिलर्स ने यह बात उठाई है कि गेहूं की अधिकांश खरीद ऐसे लोगों द्वारा की जा रही है जो सरकार से सस्ते गेहूं खरीदकर उसे मंडियों में ऊंचे दाम पर बेच रहे हैं। इस पर एफसीआई ने व्यापारियों को इस गेहूं की खरीद प्रक्रिया से अलग कर दिया है।
अब केवल प्रोसेसर्स, आटा चक्की और फ्लोर मिलर्स ही गेहूं की ई-नीलामी में सम्मिलित हो सकते हैं। एफसीआई के इस निर्णय से केवल वास्तविक उपयोगकर्ता ही सस्ते सरकारी गेहूं की खरीद कर पाएंगे ।जबकि व्यापारियों को इस नीलामी में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी। जानकारों का मानना है कि अब तक हुई साप्ताहिक ई-नीलामी के दौरान खाद्य निगम द्वारा मिलर्स को बहुत कम मात्रा में गेहूं की बिक्री की गई।
यदि व्यापारियों को इस नीलामी से दूर रखा जाता है तो खाद्य निगम को बिक्री की उच्चतम सीमा में बढ़ोत्तरी करनी चाहिए जो वर्तमान में 100 टन निर्धारित है। मिल संचालक मिथलेश सोनी ने बताया बड़े फ्लोर मिलर्स द्वारा प्रतिमाह 3000 टन तक गेहूं की प्रोसेसिंग की जाती है जबकि नीलामी के तहत उसे हर माह अधिक से अधिक 400 टन की खरीदने का अवसर मिल सकता है। मिलर्स की क्वांटिटी बढ़ाई जाती है तो उन्हें बाहर से महंगे से महंगे दाम पर गेहूं नहीं खरीदना पड़ेगा ।हालांकि इससे छोटे स्तर पर गेहूं का व्यापार करने वालों को दिक्कत का सामना करना पड़ेगा।

नसीम खान संपादक

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