नसीम खान
सांची,,,विश्व धरोहर के रूप में देश-दुनिया में पहचान रखने वाला सांची क्षेत्र केवल बौद्ध स्मारकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके आसपास का पूरा क्षेत्र प्राचीन ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक धरोहरों से भरा पड़ा है। पुरातत्व विभाग द्वारा जिन महत्वपूर्ण स्मारकों को अपने अधीन लेकर संरक्षित किया गया है, उनके अलावा क्षेत्र में आज भी अनेक प्राचीन शिल्पाकृतियां और पुरावशेष खुले में बिखरे हुए हैं। संरक्षण और देखरेख के अभाव में इनमें से कई धरोहरें अब नष्ट होने की कगार पर पहुंचती दिखाई दे रही हैं।
जानकारी के अनुसार सांची और आसपास का क्षेत्र सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत को अपने में समेटे हुए है। बौद्ध स्मारकों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए पुरातत्व विभाग द्वारा प्रयास किए गए हैं, लेकिन विभाग की संरक्षित सीमा से बाहर मौजूद अनेक पुरावशेष आज भी उचित संरक्षण की बाट जोह रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि समय रहते इन धरोहरों को चिन्हित कर सुरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल विरासत को केवल तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
नागौरी की पहाड़ी में बिखरी विरासत
समीपवर्ती नागौरी की पहाड़ी भी अपनी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विशेषताओं के लिए उल्लेखनीय बताई जाती है। यहां जगह-जगह प्राचीन पत्थर की शिल्पाकृतियां दिखाई देती हैं। ग्रामीणों के अनुसार पहाड़ी पर मौजूद एक प्राचीन प्रतिमा को नागदेवता से जोड़ा जाता है। स्थानीय लोग इसे अपनी विरासत मानकर वर्षों से इसकी देखरेख करते आ रहे हैं तथा तीज-त्योहारों पर यहां पूजा-अर्चना और दीप प्रज्वलित किए जाते हैं।
इसी क्षेत्र में पत्थर से निर्मित एक प्राचीन घोड़ी की प्रतिमा भी मौजूद है। स्थानीय लोगों के अनुसार कभी इसके साथ एक छोटी आकृति भी हुआ करती थी, जो अब मौजूद नहीं है। वर्तमान में बची यह पत्थर की प्रतिमा भी खुले में पड़ी हुई है और उचित संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने का खतरा बना हुआ है।
ग्रामीणों ने संभाल रखी है पुरखों की विरासत
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पुरासंपदाओं को सुरक्षित रखने में स्थानीय ग्रामीण वर्षों से अपनी भूमिका निभाते आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनके पुरखों ने भी इन धरोहरों को संभालकर रखा था और अब वे इसे अपनी विरासत मानकर यथासंभव संरक्षण कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि स्थानीय लोग इनकी देखभाल नहीं करते तो शायद ये पुरावशेष अब तक नष्ट हो चुके होते।
बताया जाता है कि जागरूक नागरिकों द्वारा पूर्व में पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से इन प्राचीन धरोहरों को सुरक्षित स्थान अथवा संग्रहालय परिसर में संरक्षित किए जाने का अनुरोध भी किया गया था, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी।
सवाल यह है कि जब सांची की पहचान ही इतिहास और विरासत से है, तो मुख्य स्मारकों के बाहर बिखरी इस पुरासंपदा की सुध आखिर कौन लेगा?




