नसीमखान सांची
सांची,, नगर में स्थापित पशु चिकित्सालय का उद्देश्य पशुओं को उपचार उपलब्ध कराना था, लेकिन हकीकत यह है कि सड़कों पर रोज़ाना घायल और तड़पते बेजुबान पशु भटकते रहते हैं और चिकित्सालय के जिम्मेदार उनकी सुध तक नहीं लेते।
नगर और राष्ट्रीय राजमार्ग पर बड़ी संख्या में आवारा पशु सड़कों पर बैठे रहते हैं। आए दिन तेज़ रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर ये पशु गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, लेकिन उपचार के अभाव में तड़पते-भटकते हुए मौत को गले लगाने को मजबूर हो जाते हैं। हाल ही में एक सांड गंभीर रूप से घायल होकर लंगड़ाता फिर रहा था, जिसके घावों में कीड़े तक पड़ चुके थे। नगरवासियों ने स्वयं पहल कर विदिशा से निजी चिकित्सक बुलाकर उसका इलाज कराया, लेकिन सांची का पशु चिकित्सालय इस दौरान पूरी तरह मौन बना रहा।
इसी बीच सरचंपा गांव में लडय्यों के हमले में लगभग 40 से अधिक बकरी, गाय और भैंस घायल हो गए। जैसे ही मामला सामने आया, चिकित्सालय के सहायक पशु चिकित्सक शुभम मिश्रा मौके पर पहुंचे और उपचार किया। इस पर सहायक पशु चिकित्सक सुरभि बुनकर का कहना है कि “हमें घायल सांड की सूचना नहीं मिली, सूचना मिलती तो हम उसका भी उपचार करते, अब हम स्वयं सांड को ढूंढकर इलाज शुरू करेंगे।”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि —जब बसस्टैंड परिसर सहित नगर की मुख्य सड़कों पर रोज़ घायल पशु भटकते हैं, तो क्या पशु चिकित्सालय के जिम्मेदारों को यह दिखाई नहीं देता?
नगर के बीचोंबीच स्थित चिकित्सालय को घायल पशुओं की सुध लेने के लिए भी सूचना का इंतज़ार क्यों करना पड़ता है?
यह स्थिति साफ़ तौर पर पशु चिकित्सालय की गंभीर लापरवाही और संवेदनहीनता को दर्शाती है। जब आवारा और घायल पशु सड़कों पर खुलेआम भटक रहे हैं, तब भी चिकित्सक आंख मूंदकर बैठे रहें तो सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर पशु चिकित्सालय की जरूरत ही किसलिए?
नगरवासियों की मांग है कि पशु विभाग तत्काल सक्रिय होकर घायल बेजुबान पशुओं के लिए आपातकालीन उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करे, वरना विभाग की यह लापरवाही न सिर्फ़ पशुओं के लिए बल्कि सड़क सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती है।






