नसीम खान सांची
भीषण गर्मी और फसल भुगतान संकट के बीच कृषि विभाग की रथयात्रा पर उठे सवाल, प्रधानमंत्री के तेल बचत संदेश की भी अनदेखी के आरोप।
सांची,,, एक ओर भीषण गर्मी का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर किसान अपनी फसल तुलाई और भुगतान की समस्याओं से जूझ रहा है। अधिकांश किसान मंडियों में तुलाई के बाद अपने भुगतान के लिए बैंकों की लंबी कतारों में खड़े नजर आ रहे हैं। ऐसे समय में कृषि विभाग द्वारा कृषि रथयात्रा निकाले जाने से सवाल खड़े होने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, किसान अभी अपनी उपज की तुलाई और भुगतान प्रक्रिया से पूरी तरह निपट भी नहीं पाया है। तेज गर्मी के बीच किसान बैंक और मंडियों के चक्कर लगाने को मजबूर है। इसी दौरान कृषि विभाग द्वारा दीवागंज से कृषि रथयात्रा का शुभारंभ किया गया, जो गांव-गांव पहुंचकर किसानों को कृषि आईडी, भूमि की उपजाऊ क्षमता, उर्वरक शक्ति, बीज एवं अन्य कृषि संबंधी जानकारियां उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चलाई जा रही है।
हालांकि, इस रथयात्रा को लेकर लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि जब किसान अपनी मूल समस्याओं से जूझ रहा है, तब विभाग द्वारा डीजल खर्च कर रथयात्रा निकालना कितना उचित है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय तेल संकट को लेकर प्रधानमंत्री ने देशवासियों से तेल बचत की अपील की थी और वाहनों का कम से कम उपयोग करने तथा वर्चुअल व्यवस्था अपनाने पर जोर दिया था। इसके बावजूद कृषि विभाग द्वारा रथयात्रा संचालित किए जाने को लेकर लोगों में नाराजगी दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं किसानों को जब कृषि विभाग में अपने कार्यों के लिए जाना होता है तब वह कृषि कार्यालय में भटकते दिखाई दे जाते है तब आसानी से किसानों के हित में चलने वाली योजना कहाँ तक कारगर साबित हो रही होंगी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग ने न तो बढ़ते तापमान को गंभीरता से लिया और न ही किसानों की मौजूदा समस्याओं को प्राथमिकता दी। ऐसे में यह रथयात्रा केवल औपचारिकता और दिखावा बनकर रह जाने की आशंका जताई जा रही है।
इस मामले में कृषि विभाग अधिकारी क्या कहते है।
वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी सांची, सीएल अहिरवार ने बताया कि शासन के निर्देशानुसार रथयात्रा आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य किसानों को कृषि आईडी, भूमि की उर्वरक क्षमता, बीज संबंधी जानकारी एवं आगामी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना है।।
जब किसान भुगतान और गर्मी की दोहरी मार झेल रहा हो, तब योजनाओं की जमीनी प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।





