नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG को लेकर उठे विवाद ने अब राष्ट्रीय राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में नई बहस को जन्म दे दिया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर सामने आने के बाद विपक्षी दल इसे छात्रों की आवाज़ की जीत बता रहे हैं, वहीं इसे शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे में लिखा है कि वह पिछले चार दशकों से छात्र हित, शिक्षकों के अधिकार और शिक्षा सुधार के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं। उनका कहना है कि 20 लाख से अधिक छात्रों की परीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से संपन्न कराना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। इसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और विभिन्न एजेंसियों के साथ लगातार समन्वय स्थापित किया गया।
उन्होंने कहा कि पिछले दिनों हुई घटनाओं ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से बेहद आहत किया है। शिक्षा व्यवस्था पर जनता का विश्वास सर्वोपरि है और यदि किसी कारण से उस विश्वास को ठेस पहुंचती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होना भी आवश्यक है। इसी भावना के साथ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेजा है।
छात्रों के भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता
NEET-UG विवाद ने देश के लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर लंबे समय से सवाल उठाए जा रहे थे। छात्रों का कहना है कि उनकी वर्षों की मेहनत का मूल्यांकन पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। ऐसे में यह मामला केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की पूरी परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को भी मजबूती दे रहा है।
विपक्ष ने साधा निशाना
विपक्षी दलों ने इसे छात्रों के संघर्ष की जीत बताते हुए केंद्र सरकार से शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों की मांग की है। वहीं राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को आगामी समय में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार के अगले फैसले पर टिकी हैं। शिक्षा मंत्रालय की नई जिम्मेदारी किसे सौंपी जाएगी और NEET समेत अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कौन से कदम उठाए जाएंगे, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।





