आर्टिकल : नवेद खान (Live khabar india)
विदिशा, मध्यप्रदेश
लखपति दीदी से बेरोजगारी के मुहाने तक!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2023 को लाल किले से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए 2 करोड़ ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य सामने रखा था। इस पहल का उद्देश्य महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की आय बढ़ाकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था।
लखपति दीदी की सोच सिर्फ महिलाओं की आमदनी बढ़ाने तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे उद्देश्य था कि ग्रामीण महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों, परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करें और रोजगार के जरिए आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकें।
लेकिन मध्य प्रदेश के विदिशा में कुछ महिलाओं की कहानी अब इसी सपने के उलट सवाल खड़े कर रही है।
यहां करीब पांच साल पहले जिन महिलाओं को सरकारी दुकानों के जरिए अपना कारोबार शुरू करने का अवसर दिया गया था, अब उन्हीं दुकानों को लेकर टेंडर और किराए की नई व्यवस्था सामने आई है।
महिलाओं का आरोप है कि इससे उनका वर्षों से चल रहा रोजगार संकट में पड़ गया है।
पांच साल पहले मिली थी दुकान, अब छिनने का डर
विदिशा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी कुछ महिलाओं को करीब पांच साल पहले शहर में दुकानें उपलब्ध कराई गई थीं।
उद्देश्य था कि महिलाएं गांव के घरेलू कामकाज तक सीमित न रहें, बल्कि शहर में अपना छोटा कारोबार शुरू करें और नियमित आमदनी का जरिया बनाएं।
महिलाओं ने भी प्रशासन की इस पहल को अवसर के रूप में लिया।
किसी ने चाय-नाश्ते का कारोबार शुरू किया तो किसी ने अपनी जरूरत और हुनर के हिसाब से दुकान में काम शुरू किया।
धीरे-धीरे इन दुकानों से उनका घर चलने लगा।
बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों में इन दुकानों से होने वाली कमाई मददगार बनी।
लेकिन अब यही दुकानें उनके लिए चिंता का कारण बन गई हैं।

भागबाई की आंखों में आंसू, हाथ जोड़कर रोजगार बचाने की गुहार
भागबाई कुशवाह की आंखों में आंसू हैं।
उनके लिए दुकान महज एक सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि पिछले पांच साल की मेहनत और परिवार की रोजी-रोटी का सहारा है।
गांव से शहर आकर उन्होंने अपना काम खड़ा किया। धीरे-धीरे कारोबार को संभाला और दुकान को अपनी आय का जरिया बनाया।
अब जब दुकान को लेकर नया आदेश सामने आया है तो भागबाई के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे उनका रोजगार कैसे चलेगा।
वह अधिकारियों से गुहार लगा रही हैं।
उनकी आंखों से निकलते आंसू उस डर को बयां कर रहे हैं, जिसमें उन्हें अपनी वर्षों की मेहनत और रोजगार दोनों के छिन जाने की आशंका है।
भागबाई का कहना है कि सरकार ने जिस दुकान के जरिए उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया था, आज उसी दुकान को बचाने के लिए उन्हें अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

अर्चना राजपूत की भी यही कहानी
भागबाई अकेली नहीं हैं।
अर्चना राजपूत भी गांव से शहर आईं और उन्होंने चाय-नाश्ते का कारोबार शुरू किया।
उम्मीद थी कि अपना रोजगार होगा तो परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी।
उन्होंने दुकान में मेहनत की, ग्राहकों को जोड़ा और धीरे-धीरे अपना कारोबार खड़ा किया।
लेकिन अब दुकान को लेकर सामने आई टेंडर प्रक्रिया ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।
अर्चना के मुताबिक, वह अपने रोजगार को बचाने के लिए मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान तक गुहार लगा चुकी हैं।
उनका कहना है कि अगर दुकान चली गई तो उनके सामने दोबारा रोजगार खड़ा करने का बड़ा संकट होगा।

₹8 हजार किराए ने बढ़ाई चिंता
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल दुकानों के नए आवंटन और किराए को लेकर है।
आजीविका मिशन विभाग के अनुसार दुकानों के संचालन के लिए टेंडर प्रक्रिया अपनाई जा रही है और दुकान लेने के लिए करीब ₹8 हजार मासिक किराया तय किया गया है।
विभाग का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया के जरिए दूसरी महिलाओं को भी इन दुकानों का लाभ मिल सकेगा।
लेकिन दूसरी तरफ पहले से कारोबार कर रही महिलाओं के सामने सवाल है कि उन्होंने जिस दुकान में पांच साल मेहनत करके कारोबार खड़ा किया, अगर वही दुकान टेंडर प्रक्रिया में चली जाती है तो उनके भविष्य का क्या होगा?
महिलाओं की चिंता सिर्फ किराए की रकम को लेकर नहीं है।
उनका सवाल है कि क्या उनकी वर्षों की मेहनत, बनाया हुआ ग्राहक वर्ग और स्थापित कारोबार भी इस प्रक्रिया में कोई मायने रखेगा?

आत्मनिर्भरता की योजना और जमीन पर खड़ा सवाल
लखपति दीदी पहल का व्यापक उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। केंद्र सरकार के अनुसार स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की टिकाऊ आय बढ़ाना इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ऐसे में विदिशा की महिलाओं का मामला एक स्थानीय प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे जाकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
अगर किसी महिला को रोजगार शुरू करने के लिए सरकारी सहयोग मिलता है और वह पांच साल में अपना कारोबार खड़ा कर लेती है, तो क्या अगला कदम उसके रोजगार को और मजबूत करना नहीं होना चाहिए?
दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से अधिक महिलाओं को दुकानों का अवसर मिल सकता है।
यानी एक तरफ पुरानी लाभार्थी महिलाओं के रोजगार का सवाल है और दूसरी तरफ नई महिलाओं को अवसर देने की प्रशासनिक व्यवस्था।
अब जरूरत इस बात की है कि दोनों पक्षों के बीच ऐसा रास्ता निकले, जिससे महिलाओं की मेहनत और रोजगार भी सुरक्षित रहे और दूसरी पात्र महिलाओं को भी अवसर मिल सके।
पांच साल की मेहनत पर एक बड़ा सवाल
इन महिलाओं ने सरकारी सहायता को सिर्फ सहायता बनकर नहीं रहने दिया।
उन्होंने उसे रोजगार में बदला।
रोजगार को आमदनी में बदला।
और आमदनी को परिवार की उम्मीद बना दिया।
आज वही महिलाएं अधिकारियों के दरवाजे पर खड़ी हैं।
किसी की आंखों में आंसू हैं…
किसी के हाथ जुड़े हैं…
और किसी के सामने परिवार की रोजी-रोटी का सवाल।
सवाल सिर्फ ₹8 हजार किराए का नहीं है।
सवाल उन पांच सालों की मेहनत का भी है, जो इन महिलाओं ने अपनी दुकान को खड़ा करने में लगा दिए।
अब देखना होगा कि प्रशासन इन महिलाओं की परेशानी को किस तरह देखता है और क्या इनके रोजगार को बचाने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता निकाला जाता है।
क्योंकि आत्मनिर्भरता का असली मतलब सिर्फ रोजगार शुरू करवाना नहीं, बल्कि उस रोजगार को टिकाऊ बनाना भी है।





