नसीमखान
सांची।। जैसे-जैसे मानसून जोर पकड़ रहा है, वैसे-वैसे सड़कों पर आवारा और पालतू पशुओं का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। विशेष रूप से भोपाल-विदिशा राष्ट्रीय राजमार्ग, जो पहले से ही भारी वाहनों की तेज रफ्तार आवाजाही का गवाह है, अब इन बेजुबान पशुओं की उपस्थिति से और भी अधिक खतरनाक होता जा रहा है। तेज बारिश और भीगी सड़कों के बीच जहां वाहन चालक नियंत्रण बनाए रखने में संघर्ष कर रहे हैं, वहीं बीच सड़क पर बैठे मवेशी आए दिन दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं।
यह स्थिति केवल दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इन हादसों में कई निर्दोष पशु असमय काल का ग्रास बन जाते हैं, जबकि अनेक घायल अवस्था में सड़कों पर तड़पते नजर आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि ये सभी पशु लावारिस नहीं हैं — इनमे बड़ी संख्या में पालतू पशु भी शामिल हैं, जिन्हें उनके मालिक बारिश के दिनों में खुले में छोड़ देते हैं क्योंकि उनके पास रखने की समुचित व्यवस्था नहीं है।
प्रशासन द्वारा समय-समय पर चेतावनियां दी जाती रही हैं, परंतु उनका कोई स्थायी असर नजर नहीं आता। न तो पशु मालिक अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं, और न ही प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्यवाही सामने आ पा रही है। नतीजा यह है कि वाहन चालकों को हर रोज जोखिम उठाना पड़ता है। दुर्घटना के बाद यदि वाहन चालक पशु को टक्कर मार दे, तो उन्हें स्थानीय लोगों की नाराजगी, मारपीट और पशु के नुकसान की भरपाई जैसी स्थितियों से भी दो-चार होना पड़ता है। कई बार ऐसे मामलों में कथित गो-सेवक भी हस्तक्षेप करते हैं, जिससे मामला और अधिक गंभीर हो जाता है।
शासन ने गायों के संरक्षण और देखभाल के लिए गौशालाओं के निर्माण हेतु करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, किंतु हकीकत यह है कि अधिकांश गौशालाएं या तो गैरसक्रिय हैं या फिर कागजों में ही सजीव हैं। पशु वहीं के वहीं सड़कों पर मंडराते रहते हैं। सांची से लेकर विदिशा, काछीकानाखेड़ा, आमखेड़ा, ढकना चपना, रायसेन तिराहा से लेकर भोपाल तक हर मार्ग पर पशुओं की मौजूदगी साफ देखी जा सकती है।
प्रशासनिक चेतावनियां और कथित सख्त निर्देश भी पशु मालिकों को चेताने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। नतीजतन, आमजन और वाहन चालक दोनों ही इस अव्यवस्था की कीमत अपनी जान जोखिम में डालकर चुका रहे हैं। अगर समय रहते ठोस और कड़ाई से पालन करने योग्य नीति नहीं बनाई गई, तो यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है ।






