नसीमखान सांची, रायसेन
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं म.प्र. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर के निर्देशानुसार दिनांक 09 मई 2026 को जिला मुख्यालय रायसेन सहित जिले की सभी तहसील न्यायालयों में वर्ष 2026 की द्वितीय नेशनल लोक अदालत का आयोजन उत्साहपूर्वक एवं सफलतापूर्वक किया गया।
जिला मुख्यालय में नेशनल लोक अदालत का शुभारंभ माननीय प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीष महोदय श्री अनिल कुमार सोहाने द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर किया गया।
जिला मुख्यालय रायसेन में उक्त कार्यक्रम में माननीय प्रधान जिला न्यायाधीष महोदय सहित प्रधान न्यायाधीश, कुटुम्ब न्यायालय श्री अरविन्द जैन, तृतीय जिला न्यायाधीश श्री कमलेश कुमार इटावदिया, प्रथम जिला न्यायाधीश श्री सुनील कुमार शौक, द्वितीय जिला न्यायाधीश श्री महेश कुमार माली, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री अजय कुमार यदु, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण रायसेन श्रीमती हर्षिनी यादव, न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती सौम्या साहू अस्थाना, श्रीमती ज्योति चतुर्वेदी न्यायिक मजिस्ट्रेट, श्री संचित अस्थाना न्यायिक मजिस्ट्रेट, श्री गृजेष सिंह बघेल प्रशिशु न्यायाधीष, श्री अनीस उद्दीन अब्बासी जिला विधिक सहायता अधिकारी, श्री विनयकांत चतुर्वेदी अध्यक्ष, जिला अधिवक्ता संघ, विद्युत विभाग, नगर पालिका, बीएसएनएल एवं बैंकों के अधिकारीगण, अधिवक्ता एवं पक्षकार गण उपस्थित रहे।
लोक अदालत में राजीनामा योग्य प्रकरणों के शीघ्र एवं सौहार्दपूर्ण निराकरण के लिए जिले में कुल 23 खंडपीठों का गठन किया गया। इन खंडपीठों द्वारा न्यायालयों में लंबित 407 प्रकरणों तथा 1318 प्री-लिटिगेशन प्रकरणों सहित कुल 1725 मामलों का आपसी सहमति से निराकरण किया गया। इन मामलों में कुल 99144803/- की समझौता राशि निर्धारित हुई, जिससे 2085 व्यक्तियों को लाभ मिला।
10 लाख के चेक से शुरू हुआ विवाद, लोक अदालत में खत्म हुई 13 साल पुरानी दूरियां
प्रकरण क्रमांक एस.सी.एन.आई.ए. 100744/2013 कैलाश चैहान विरुद्ध निर्भय सिंह एक 10 लाख रुपये के चेक विवाद से जुड़ा हुआ था। कभी गहरे मित्र रहे दोनों पक्ष एक ही समाज और मोहल्ले के निवासी थे, लेकिन लेन-देन के विवाद ने उनकी दोस्ती को दुश्मनी में बदल दिया। मामला न्यायालय पहुंचा और देखते ही देखते 13 वर्ष बीत गये।
इन वर्षों में दोनों ने न केवल पैसा और समय गंवाया, बल्कि आपसी विश्वास और मानसिक शांति भी खो दी। हर तारीख के साथ रिश्तों की दूरी बढ़ती गई।
लोक अदालत में इस न्यायालय ने मामले को केवल कानूनी विवाद नहीं, बल्कि टूटते रिश्तों के रूप में देखा। दोनों पक्षों से अलग-अलग बातचीत की गई। उन्हें समझाया गया कि अदालतें फैसले दे सकती हैं, लेकिन मन की शांति केवल समझौते से मिलती है।
जब लोक अदालत में दोनों आमने-सामने बैठे, तो शुरुआत में माहौल भारी था। पुराने गिले-शिकवे आंखों में साफ दिखाई दे रहे थे। तभी उन्हें उनकी पुरानी दोस्ती, मोहल्ले की पहचान और परिवारों की शांति का एहसास कराया गया। कुछ क्षणों की खामोशी के बाद दोनों के चेहरे नरम पड़े और वर्षों की नाराजगी पिघलने लगी।
आखिरकार दोनों ने मुस्कुराते हुए समझौते पर हस्ताक्षर किये और 13 साल पुरानी रंजिश समाप्त हो गई। जिस 10 लाख के चेक ने दो दोस्तों को अलग कर दिया था, उसी प्रकरण ने लोक अदालत के माध्यम से उन्हें फिर से बातचीत और विश्वास की राह पर ला खड़ा किया।
यह सफलता की कहानी दर्शाती है कि लोक अदालत केवल मामलों का निराकरण नहीं करती, बल्कि टूटते रिश्तों को भी जोड़ने का कार्य करती है।





