जनपद पंचायत सांची अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों में बजट का अभाव तो कुछ उड़ा रहे गुलछर्रे
सरकारी योजनाएं आमजन से दूर।

नसीम खान संपादक
सांची,,, सांची जनपद पंचायत अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों में बजट का अभाव होने से जनकल्याणकारी योजनाएं धरातल पर नहीं पहुंच पा रही तो दूसरी ओर पंचायत सचिवों को वित्तीय अधिकार की दरकार बनी हुई है। जिनके पास अधिकार है जहां निर्माण कार्य चलाये जा रहे वहां जिम्मेदार देखने की जहमत नहीं उठा पा रहे हैं जिससे सरकारी राशि में चल रही भर्राशाही ।
जानकारी के अनुसार सांची जनपद पंचायत अंतर्गत आने वाली 82 ग्राम पंचायतों में के इन दिनों हाल बेहाल बने हुए हैं कुछ पंचायतों में सचिव वित्तीय अधिकार की बाट जोह रहे हैं तो दूसरी ओर जहां वित्तीय अधिकार मिल चुके हैं वहां निर्माण कार्य तो चलाये जा रहे हैं परन्तु इन निर्माण को जिम्मेदार देखने की जहमत नहीं उठा पा रहे हैं जिससे सरकारी राशि को पलीता लग रहा है तथा जमीनी स्तर पर पहुंचने से पहले ही जनहित कारी योजनाएं दम तोड़ रही है इतना ही नहीं कुछ ग्रामपंचायतों में सरकारी राशि का बंदरबांट का खेल भी किसी से छिपा नहीं है ऐसे निर्माण में ग्राम पंचायतों को न तो अपने वरिष्ठ अधिकारियों न ही इंजीनियरों से ही सहमति की आवश्यकता पड़ रही है तथा जिन पंचायतों में इंजीनियरों का अभाव है वहां सरकारी राशि उड़ानें में मजे ही मजे हो रहे हैं तब अधिकारियों की अनदेखी के चलते पंचायतों में भर्राशाही जोर-शोर से चल रही है। इतना ही नहीं सरपंच सचिवों की मिली भगत से अपने चहेतों के फर्जी बिल बाउचर एवं उनके नाम वेंडर बना कर लाखों करोड़ों का चूना सरकार को लगाया जा रहा है तथा खर्च करने वाली राशि पर किसी जिम्मेदार की अनुमति भी जरूरी न होने से संदेहास्पद बना हुआ है जबकि अन्य जिलों में निर्माण हेतु जिम्मेदार अधिकारी से अनुमति लेनी आवश्यक की गई है जबकि सांची जनपद पंचायत में ऐसे किसी भी कार्य पर होने वाले व्यय पर बिना अनुमति ही मनमाने ढंग से खर्च करना आम हो चुका है।तब जहां समझ आया वहां सरकारी राशि खर्च करने की नीति बना ली गई है तथा नहीं जांच न ही सरकारी राशि खर्च होने का भय ही रहा है जबकि ग्राम पंचायतों में सरकारी राशि खर्च करने पर अंकुश लगाने जनपद पंचायत सीईओ पंचायत निरीक्षक उपयंत्री बीडीयो जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदार होते हुए भी उनकी अनुमति आवश्यक नहीं समझी जाती इस स्थिति में अधिकारी भी मात्र अपने दफ्तरों में बैठकर कूलरों की हवा लेते दिखाई दे जाते हैं । बताया तो यहां तक जाता है कि उपयंत्रियो से ग्राम पंचायतों को न तो सहमति न ही अनुमति की ही आवश्यकता रह गई है इस मामले में कुछ पंचायत सचिवों ने बताया कि ग्राम पंचायतों में होने वाले निर्माण सहित अन्य कार्य में किसी की आवश्यकता नहीं होती है इतना ही नहीं मनरेगा अंतर्गत गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराने सरकार ने मजदूरों से मजदूरी करने नियम बना डाले परन्तु इन नियमों को जब धता बता दिया जाता है जब जाबकार्ड धारियों से काम कराने के नाम पर मशीनों से शुरू कर दिया जाता है हालांकि मशीनों से होने वाली करतूत किसी से छिपी नहीं रही न ही इस पर सरकार ही कोई कदम उठा सकी। बावजूद इसके शासन की रोज न ई योजनाओं को धरातल पर उतारा तो जा रहा है परन्तु यह कारगर साबित नहीं हो पा रही है ।

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