छत्तीसगढ़ में आदिवासी सी,एम ,की मांग
मुख्यमंत्री,भूपेश बघेल परेशान

जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़
दिलेसर चौहान,, संवाददाता छग,

छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेश दोनों दलों के बीच आमने सामने की लड़ाई होती है ।
दो ध्रुवी राजनीति होने के कारण दोनों दल आमने-सामने की सीधी टक्कर होती है,।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठती रही है।

दोनों दलों के नेता भलीभांति समझते हैं ,।
सन 2000 में प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी आदिवासी मुख्यमंत्री रहे।
2003 के चुनाव में भाजपा ने भी मुख्यमंत्री के तौर पर रमेश बैस को आगे कर आदिवासी मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया था।
भाजपा के बहुमत में आने के बाद रमन सिंह ठाकुर को मुख्यमंत्री बना दिया गया।
जिससे आदिवासी समाज को ठेस पहुंचा था।
रमेश भैंस को राज्यपाल बनाकर छत्तीसगढ़ से बाहर भेज दिया ।जिससे उनके मतदाता उनसे दूर हो गए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की संख्या पचास, लाख है।
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की बहूबलता है, तो आदिवासियों की मुख्यमंत्री की मांग होना लाजमी है।
अब जबकि 2023 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव होने हैं, तो राजनीति में सर्व आदिवासी समाज अपने बैनर तले चुनाव लड़ने की मंशा बना रहा है।
जो अब खुलकर कांग्रेस और भाजपा को चैलेंज कर रहा है,
मगर देखने वाली बात है की आदिवासी समाज कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा है ।
सर्व आदिवासी समाज अपने बलबूते चुनाव लड़ता है ,तो कांग्रेस को भारी नुकसान हो सकता है।
ऐसे में सीएम भूपेश बघेल के लिए राह कठिन हो जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम आदिवासी नेता है।
मगर पूरे छत्तीसगढ़ में उनकी छाप नहींहै।
वहीं भाजपा से बगावत कर आए नंदकुमार साय आदिवासी कद्दावर नेता है।जिसने भाजपा को मजबूत बनाने में काफी अहम भूमिका निभाया ।
और आज वह कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष बनने वाले हैं ।अगर आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग जोर पकड़ती है ,तो कांग्रेस पार्टी संभवत नंदकुमार साय को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर सकती है।
वैसे देखा जाए तो 1986 के विधानसभा में बसपा संस्थापक कांशीराम ने भी कांग्रेस से बगावत करके बीएसपी में शामिल हुए अरविंद नेताम को मध्य प्रदेश, जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल था।मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा किया था ।
40 सालों से छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठती रही है ।
मगर आदिवासियों को केवल वोट बैंक के रूप में मुख्य पार्टी इस्तेमाल करते रहे हैं ।
आज हालात बदल गए हैं, आदिवासियों में सोच शासन करने की चेतना आई है।
जो 2023 विधानसभा में कितने मजबूती से चुनाव लड़ते हैं ,तीसरा विकल्प के रूप में अगर आते हैं ,तो भाजपा और कांग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत हो सकती है ।
अभी कहना जल्दबाजी होगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा ,अभी चुनाव में 7 महीने की देरी है ।जैसे-जैसे नजदीक चुनाव आएगा सब कुछ स्पष्ट झलक आने लगेगा।

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