कभी आर्थिक संकट से जूझ रहीं गीता बाई ने अपनी मेहनत से लिखी सफलता की कहानीस्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद सात से आठ लाख रू तक सालाना हो रही आमदनीजैविक खेती से शुरूआत कर औषधीय खेती, वर्मी कम्पोस्ट, मत्स्य उत्पादन और मुर्गी पालन भी कर रहीं है गीता बाई

नसीमखान सांची, रायसेन

रायसेन,
मन में कुछ करने का इरादा हो और वह इरादा पक्का हो तो मुसीबतें चाहे कितनी भी आएं, सफलता जरूर मिलती है। इस बात को रायसेन जिले के सिलवानी विकासखण्ड की सियरमउ गांव की श्रीमती गीता बाई ने चरितार्थ किया है। कभी आर्थिक संकट से जूझ रहीं गीता बाई ने स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त पहचान बनाई है और आज प्रति वर्ष लगभग सात से आठ लाख रू आय अर्जित कर रही हैं। आठवीं कक्षा तक पढ़ीं श्रीमती गीता बाई वर्ष 2018 में गीता बाई के कुश स्व-सहायता समूह से जुड़ी। उनके द्वारा आजीविका गतिविधियों में कृषि औषधीय पौधे, जैविक सब्जियां तथा वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन, मत्स्य पालन एवं मुर्गी पालन का कार्य किया जा रहा है। वह महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं। गीता बाई कहती हैं कि सरकार द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेक योजनाएं तथा कार्यक्रम चलाए जा रहे है, महिलाओं को इनका लाभ लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

स्व-सहायता समूह में शामिल होने से पहले की स्थितिश्रीमती गीता बाई कुशवाह की कम उम्र में ही शादी हो गई थी। परिवार के पास 5 एकड़ जमीन थी और परिवार पूरी तरह से कृषि पर निर्भर था। जलवायु एवं मौसम में अनिश्चितता के कारण वर्षा आधारित कृषि में उत्पादन की अनिश्चितता के कारण परिवार का गुजर बसर मुश्किल से होता था। परिवार को कृषि से अधिक लाभ न होने के कारण आय के लिए मजबूरन परिवार को आसपास के ग्रामों में खेतिहर मजदूर के रूप में काम करना पडता था। इन मुश्किल परिस्थितियों के कारण परिवार को मुश्किल से 60000-80000 रूपये वार्षिक आय होती थी। जिससे उनको अपने बच्चों की बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने में बहुत ही समस्याएं आती थी।

समूह में शामिल होने के बाद जीवन में आया बदलाव श्रीमती गीता अपने ग्राम सियरमउ में मध्यपद्रेश डे. राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के समूह की दीदीयों से मिलीं, आजीविका मिशन की अवधारणा को समझने के बाद वह अपने गांव की महिलाओं द्वारा गठित कुश स्व सहायता समूह में शामिल हो गईं, शुरुआत में महिलाओं ने प्रत्येक बैठक में 100 रुपये जमा करना शुरू किया एवं आजीविका मिशन से प्राप्त चक्रीय राशि समूह से लेकर सब्जी की खेती की शुरूआत की गई। श्रीमती गीता ने कुछ महीनों के बाद सामुदायिक निवेश निधि से कर्ज लेकर उन्होंने अपने खेत में भूमि के लिए नलकूप लगवाया, जिससे उनकी 5 एकड भूमि की सिंचाई होने लगी और उत्पादन में वृद्धि हुई। श्रीमती गीता बाई ने कृषि और संबद्ध गतिविधियों के तहत विभिन्न प्रशिक्षण प्रक्रियाओं में भाग लिया। सब्जियों की खेती में रासायनिक खाद बीज की लागत ज्यादा होने के कारण लाभ कम होता था इसको देखते हुए गीता बाई ने जैविक खेती करना शुरू किया जिसमें उनको शुरूआती दिनों में अधिक परिश्रम करना पडा लेकिन इसके बाद उन्हें इसमें लाभ होने लगा और आज वह अपनी 03 एकड की भूमि में जैविक खेती उन्नत तरीके से कर रही है। इससे उन्हें 2 से 3 लाख रूपये सालाना आय अर्जित कर रही है।

जैविक सब्जी, वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादनगीता बाई को जैविक खेती ने क्षेत्र में एक अलग पहचान दी है। परिवार द्वारा उत्पादित सब्जियां पास के बाजारों में बिकती है और सियरमऊ बाजार में जैविक सब्जियों की मांग बढ़ गई है। गीता और उनका पूरा परिवार जैविक खेती कर रहा है तथा उन्होंने अपने परिवार की आय को औसतन लगभग 2 लाख रूपए प्रति वर्ष तक बढ़ाने में सफलता हासिल की है। वह 3 एकड़ जमीन में जैविक सब्जियां पैदा करती हैं। जैविक खेती ने उत्पादन लगत को कम किया तथा पैदावार में भी वृद्धि हुई है। गीता बाई केंचुआ खाद बनाने के साथ-साथ कीटनाशक दवाई भी स्वयं से तैयार कर उपयोग करती है और उपयोग करने हेतु समूह की अन्य दीदियों को प्रेरित करती है। वह न्यूनतम मूल्य पर अन्य किसानों को भी व्यक्तिगत रूप से वर्मी कम्पोस्ट और कीटनाशक उपलब्ध भी कराती हैं। गीता बई को जैविक तरीके से कीटनाशक तैयार करने के लिए रविंद्र नाथ टैगोर यूनिवर्सिटी भोपाल द्वारा सम्मानित भी किया गया है।

जैविक खेती के बाद मत्स्य उत्पादन और मुर्गी पालन भी शुरू किया जैविक खेती के अलावा श्रीमती गीता बाई और उनके परिवार ने अब मत्स्य पालन में भी एक कदम आगे बढ़ाया है। आजीविका मिशन के माध्यम से उन्होंने पहले अपनी दो एक कृषि भूमि में दो तालाब का निर्माण कराया, जिसके लिए मनरेगा की विभिन्न योजनाओं के तहत गीताबाई को सब्सिडी प्रदान की गई। मछली पालन हेतु ऋण लेकर गीताबाई द्वारा तालाबों में मत्स्य उत्पादन के लिए 12000 से 15000 बीज डाले गए। लगभग 10 महीने में ही मछलियों का 9 क्विंटल उत्पादन हुआ। इस गतिविधि ने परिवार की औसत आय को लगभग 3 लाख प्रति वर्ष तक बढ़ाने में मदद की। इससे प्रेरित होकर उन्होंने जमीन पर 03 तालाबों का और निर्माण करवाया तथा अब मछली पालन से लगभग 4 से 5 लाख रूपये कमाती है। गीता बाई की आमदनी बढ़ने से उन्होंने समूह से ऋण लेकर कड़कनाथ मुर्गी पालन छोटे स्तर पर प्रारम्भ किया और फिर इसमें बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए पक्का शेड बनवा कर कडकनाथ पालन शुरू किया है। सुरक्षा की दृष्टि से तालाबों की सी.सी. टीवी कैमरों द्वारा 24 घंटे निगरानी की जाती है। गीताबाई द्वारा समूह की अन्य दीदीओ को भी मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है एवं उन्हें गतिविधियां करने में भी मदद करती है। श्रीमती गीता बाई और उनके पति कुंदन बताते हैं कि एसआरएलएम ने उनके परिवार की आय में वृद्धि के लिए निरंतर मार्गदर्शन प्रदान किया है और उन्हें अपनी आजीविका बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है।

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