विदिशा की कलम — जमीर की गवाही


नवेद खान / NDTV पत्रकार मध्यप्रदेश
यह तस्वीर विदिशा की उस कलम की गवाही दे रही है, जिस पर अक्सर सवाल खड़े किए जाते हैं।
जिसके पक्ष में लिखो, वो खुश हो जाता है —
और जिसके खिलाफ लिखो, वो नाखुश दिखने लगता है।
पर सच यह है कि पत्रकार का व्यक्तिगत कुछ भी नहीं होता।
उसकी लड़ाई कभी आमजन के लिए होती है, तो कभी सियासत के खेल में फँसी सच्चाई के लिए।
पत्रकारिता के व्यक्तिगत मामले शायद दो प्रतिशत से भी कम होंगे… बाकी सब समाज और सच के लिए होते हैं।

आज पत्रकारिता के बीच भी कुछ ‘मैनेजर’ घुस आए हैं —
जो इस पेशे को भी मैनेजमेंट के जरिए चलाना चाहते हैं।
कभी नेताओं के करीब बनकर, कभी पुलिस या अधिकारियों के आगे बढ़ाकर,
पर समाज सब जानता है, सब समझता है।
और इन लोगों को पहचान भी मिल चुकी है — “दुकान” नाम से।

खैर, मुद्दा आज किसी एक पत्रकार का नहीं है।
मुद्दा विदिशा की पत्रकारिता का है,
मुद्दा उस जमीर का है, जो आज भी ज़िंदा है।

मामला था केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रेस वार्ता का।
हर बार की तरह इस बार भी भव्य तैयारी, बड़ा लवाजमा और मीडिया के लिए एक हाल सजा था।
शायद शिवराज जी ने भी सोचा होगा —
“हर बार की तरह किसी के कंधे पर हाथ रख दूँगा, किसी के साथ तस्वीर खिंचवा लूंगा,
पत्रकार खुश हो जाएंगे।”
पर शायद उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि अब वक्त बदल चुका है।

दोपहर एक बजे से लेकर शाम चार बजे तक पत्रकार एक छोटे से केबिन में बैठे इंतजार करते रहे।
फिर किसी के भीतर के जमीर ने आवाज दी —
“क्या हम इतने फालतू हैं कि पूरा दिन यूँ ही बर्बाद कर दें?”
और फिर वही हुआ जो इतिहास लिखता है —
बहिष्कार की आवाज उठी, और सब एक सुर में खड़े हो गए।

अधिकारियों तक खबर पहुंची, कुछ ने मान-मनौव्वल की कोशिश भी की,
पर तब तक फैसला हो चुका था —
सभी पत्रकारों ने परिसर से बाहर निकलना तय कर लिया।
कुछ ने मन मारा, कुछ चाहकर भी पीछे नहीं रह सके।
किसी के मन में ‘चहेते’ होने की टीस थी,
किसी के भीतर तारीफ़ लिखने की खुजली भी,
पर सबने एक बात समझ ली —
यह पत्रकारिता का सवाल है, व्यक्ति का नहीं।

बहिष्कार की खबर फैली, तो विपक्ष ने तालियाँ बजाईं,
पत्रकारों की एकता की सराहना की।
पर ये वही विपक्ष है जो कभी अपने खिलाफ बहिष्कार होने पर
इन्हीं पत्रकारों को कोसता है।
फिर भी सच्चाई यह है —
आज पत्रकारों ने दिखा दिया कि जमीर अभी जिंदा है।

क्या अब शिवराज जी को अपने गृह जिले के पत्रकारों की आवश्यकता नहीं रह गई है?
क्या उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि विदिशा के स्थानीय पत्रकार उन्हें कवर करें या नहीं?
या फिर यह मुगालता है कि “भोपाल से आए बड़े पत्रकार” ही सब कुछ हैं?
खबर चल तो जाएगी, क्योंकि मजबूरी है चलाने की —
पर भाव और विश्वास वहीं से गायब हो जाएंगे।

जो हर रोज़ ‘छपने’ की भूख रखते हैं,
क्या अब वो भी बाहरी पत्रकारों को बुलाकर खुद को कवर करवाएंगे?
या उन्हें अब स्थानीय मीडिया की जरूरत ही नहीं?
शायद उन्हें भरोसा है कि “चार-पाँच तो अपनी गोद में हैं”,
जो चाहे छपवा लेंगे।
आख़िर विज्ञापन की चाशनी और नाश्ते के पैकेट का हथियार तो उनके पास है ही।

फिर भी …
सवाल बहुत हैं, पर तसल्ली की बात यह है कि
विदिशा की पत्रकारिता में अभी भी जमीर जिंदा है।
भले यह अभी एक चिंगारी हो,
पर उसे शोला बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

क्योंकि जब कलम जागती है —
तो सत्ता के सिंहासन भी काँप जाते हैं।

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