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सांची,,सांची से महज़ तीन किलोमीटर दूर स्थित सूखा करार गांव, जो कभी अपने कुप्रथाओं और बदनामी के लिए जाना जाता था, आज शिक्षा और जागरूकता के क्षेत्र में मिसाल कायम कर रहा है। यहां के लोग अपनी पुरानी रीतियों को त्यागकर शिक्षा को अपनाते हुए नई पहचान गढ़ चुके हैं।
कभी यह गांव नशे की लत और पेतृक व्यवसाय (नृत्य एवं वैश्यावृत्ति) के कारण बदनाम था। लेकिन समय के साथ गांव के लोगों ने जागरूकता की राह पकड़ी। शासन की मदद और गांव के प्रबुद्ध नागरिकों के प्रयास से यहां स्कूल भवन का निर्माण हुआ और शिक्षा का अलख जगा।
आज हालात यह हैं कि गांव के लगभग हर घर का बच्चा पढ़ाई से जुड़ चुका है। जो स्कूल कभी 10-12 बच्चों तक सीमित था, अब उसमें 200 से अधिक विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। कई बच्चे शासकीय सेवाओं में चयनित हुए हैं, तो कुछ ने खेल के क्षेत्र में प्रदेश, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर गांव का नाम रोशन किया है।
गांव की पहली महिला सरपंच कृष्णा बाई ने बदलाव की नींव रखी थी। वर्तमान सरपंच अरविंद कुमार, जो खुद शिक्षित और युवा हैं, ने नशामुक्ति अभियान चलाकर गांव को पूरी तरह नशे से मुक्त कर दिया। उन्होंने हर बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही खेलकूद को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया।
इस मुहिम में बनारस के अजीत सिंह ने भी अहम योगदान दिया। उन्होंने “गुड़िया सेंटर” के माध्यम से बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना शुरू किया और खेलकूद की गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए संसाधन उपलब्ध कराए। आज गांव में बच्चों के लिए बड़ा खेल मैदान भी तैयार हो चुका है।
गांव की इस तरक्की को देखते हुए हाल ही में सरपंच अरविंद को संपूर्ण जिला सरपंच संघ का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। सरपंच अरविंद कुमार का कहना है—
“अब यह गांव पुराना गांव नहीं रहा। हमने ठान लिया है कि हर घर का बच्चा शिक्षित होगा और गांव पूरी तरह विकास की राह पर आगे बढ़ेगा।”
सूखा करार की इस नई पहचान ने न सिर्फ उसके अतीत को भुला दिया है, बल्कि आसपास के गांवों के लिए भी शिक्षा और जागरूकता की मिसाल कायम कर दी है।






