नसीमखान सांची
सांची,,,
सरकार द्वारा स्वच्छता और विकास अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को खोखला साबित कर रही है। कागजों और फोटोग्राफी तक सीमित स्वच्छता अभियान वास्तविकता में दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, विकास कार्यों की जिम्मेदारी जहां एक ओर जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को सौंपी जाती है, वहीं जमीनी स्तर पर इन्हें लागू करने में प्रशासनिक अमला उदासीन दिखाई देता है। शासन द्वारा दिए गए अधिकारों और जिम्मेदारियों के बावजूद छोटे-छोटे मुद्दों पर भी कार्रवाई नहीं हो पा रही है, जिससे सरकार की मंशा पर पानी फिरता नजर आता है।
यही स्थिति विश्व ऐतिहासिक धरोहर सांची में भी साफ देखी जा सकती है। इस स्थल को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च किए गए। निरीक्षण और जांच दल भी आते-जाते रहे, लेकिन अधिकांश जांच केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित रह गई। नतीजतन, वास्तविक विकास धरातल पर उतर ही नहीं सका।
नगर के कई क्षेत्रों में सीवर लीकेज, गंदगी और दुर्गंध आम समस्या बन चुकी है, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। वहीं, नल-जल योजना के तहत नगर की पक्की सड़कों की खुदाई तो कर दी गई, लेकिन आज भी हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचने का सपना अधूरा है। गंदगी से भरी नालियों और गड्ढों के बीच से गुजरती पेयजल लाइनें गंभीर खतरे की ओर इशारा कर रही हैं।
स्वच्छता अभियान और सौंदर्यीकरण के नाम पर खर्च की गई भारी राशि के बावजूद न तो नगर स्वच्छ बन सका और न ही सुंदर। अतिक्रमण के मामले में भी हालात ऐसे हैं मानो प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त हो। इन सबके बीच प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है और इंदौर जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
जब तक कागजी विकास से आगे बढ़कर जमीनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक स्वच्छता अभियान केवल दावों तक ही सीमित रहेंगे।






