नसीम खान|Live khabar india
“हम किसी से भीख नहीं मांगने आए हैं, हम अपना अधिकार मांगने आए हैं…”
इस एक नारे ने मंगलवार को भोपाल की सड़कों का मिजाज बदल दिया। राजधानी की ओर बढ़ते हजारों किसानों के कदमों ने न सिर्फ पुलिस के सैकड़ों बैरिकेड्स को चुनौती दी, बल्कि सरकार के सामने भी कई बड़े सवाल खड़े कर दिए। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि मध्यप्रदेश में अन्नदाताओं का आंदोलन सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया।
होशंगाबाद रोड से लेकर मिसरोद और बागसेवनिया तक किसानों का सैलाब उमड़ पड़ा। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था की, लेकिन किसानों के हौसलों के सामने एक-एक कर बैरिकेड्स बेबस नजर आए। किसानों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
राजधानी की ओर बढ़े कदम, सरकार की बढ़ी धड़कनें
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के नेतृत्व में निकला ‘किसान क्रांति मार्च’ बरखेड़ा से शुरू हुआ।
हजारों किसानों ने हाथों में झंडे और जुबान पर अधिकार की मांग लेकर राजधानी की ओर कूच किया। रास्ते में पुलिस ने कई जगह उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी आगे बढ़ते रहे।
किसानों ने सड़कों पर ही दाल-बाटी बनाकर अपना विरोध दर्ज कराया। यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं था, बल्कि अपनी मांगों को लेकर किसानों के धैर्य और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन भी था।
आखिर किसानों की मांग क्या है?
किसानों की सबसे बड़ी मांग इस वर्ष की ग्रीष्मकालीन मूंग की 100 प्रतिशत फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सरकारी खरीदी है। इसके अलावा किसानों की मांग है कि—
मूंग की पूरी सरकारी खरीदी की जाए।
खाद वितरण में लागू ई-टोकन व्यवस्था समाप्त की जाए।
कम बारिश वाले क्षेत्रों में पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराई जाए।
भावांतर भुगतान योजना को समाप्त किया जाए।
खाद वितरण प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाया जाए।
सरकार और किसानों के बीच क्यों नहीं बनी बात?
आंदोलन से पहले किसान प्रतिनिधियों और कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना के बीच बातचीत हुई थी, लेकिन यह बैठक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। हालांकि मंत्री ने बाद में सकारात्मक चर्चा होने का दावा किया, लेकिन किसानों ने आंदोलन वापस लेने से इनकार कर दिया।
कृषि मंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश के लिए मूंग खरीदी का लक्ष्य 4.54 लाख टन से बढ़ाकर 8.06 लाख टन करने की मांग की है। जबकि राज्य में इस बार करीब 20.16 लाख टन मूंग उत्पादन होने का अनुमान है। ऐसे में किसानों का सवाल है कि जब उत्पादन इतना अधिक है तो खरीदी का लक्ष्य इतना कम क्यों?
आंकड़े जो सरकार की चुनौती बढ़ा रहे हैं
प्रदेश में 20.16 लाख टन मूंग उत्पादन का अनुमान।
3.47 लाख किसानों ने फसल बेचने के लिए पंजीयन कराया।
अब तक केवल 82 हजार किसान ही अपनी फसल बेच पाए हैं।
मूंग खरीदी का वर्तमान लक्ष्य 4.54 लाख टन है।
इसे बढ़ाकर 8.06 लाख टन करने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इस बीच खाद वितरण की ‘ई-विकास’ प्रणाली को चुनौती देने वाली कृषि आदान विक्रेता संघ की याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह केंद्र सरकार का एक नीतिगत निर्णय है, जिसका उद्देश्य खाद की कालाबाजारी और जमाखोरी को रोकना है।
हालांकि किसानों का कहना है कि सर्वर की समस्याओं और तकनीकी खामियों के कारण उन्हें समय पर खाद नहीं मिल पा रही है, जिससे खेती प्रभावित हो रही है।
भोपाल की सड़कों पर थम गया ट्रैफिक
किसान आंदोलन का असर राजधानी के जनजीवन पर भी देखने को मिला। पुलिस ने सीएसआईआर-एंप्री त्रिजंक्शन से लेकर बागसेवनिया स्क्वायर तक भारी पुलिस बल तैनात किया। कई मार्गों पर वाहनों को AIIMS, कटारा हिल्स और मंडीदीप की ओर डायवर्ट किया गया, जिससे लंबे ट्रैफिक जाम की स्थिति बन गई।
एहतियात के तौर पर भोपाल के कई स्कूलों में अवकाश भी घोषित किया गया। हजारों वाहन घंटों जाम में फंसे रहे और लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
क्या आंदोलन होगा और तेज?
संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं करती है तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। किसानों का कहना है कि यह सिर्फ मूंग की खरीदी का मुद्दा नहीं है, बल्कि प्रदेश के लाखों किसानों के भविष्य का सवाल है।
निष्कर्ष
भोपाल में किसानों का यह आंदोलन सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि सरकार और अन्नदाताओं के बीच भरोसे की परीक्षा बन गया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार किसानों की मांगों पर कितना और कब तक सकारात्मक निर्णय लेती है। फिलहाल राजधानी की सड़कों पर गूंज रहा एक ही नारा इस आंदोलन की पूरी कहानी बयां कर रहा है—
“हम किसी से भीख नहीं मांगते, हम अपना अधिकार मांगते हैं।”





