पत्रकार लिखे वाहनों से पत्रकारिता की छवि हो रही धूमिल ऐसे वाहनों पर पुलिस कार्यवाही की दरकार।

नसीमखान
सांची।
इन दिनों सड़कों पर “पत्रकार” लिखे वाहनों की भरमार देखी जा रही है। स्थिति यह हो गई है कि ऐसे वाहनों की जांच करने में पुलिस भी हिचकिचाती नजर आ रही है।
आजकल पत्रकारिता के नाम पर फर्जीवाड़ा चरम पर है। कुछ लोग मामूली राशि खर्च कर फर्जी प्रेस कार्ड बनवाकर स्वयं को पत्रकार घोषित कर रहे हैं। ऐसे फर्जी पत्रकारों का न तो पत्रकारिता के मूल्यों से कोई सरोकार है और न ही सामाजिक जिम्मेदारी से।
शराब दुकानों में कमीशनखोरी से लेकर अवैध वसूली तक, इनकी गतिविधियाँ पत्रकारिता की छवि को बट्टा लगा रही हैं। जानकारी के अनुसार आए दिन नगर और ग्रामीण क्षेत्रों से खबरें आती हैं कि कुछ कथित पत्रकार सरकारी दफ्तरों, ग्राम पंचायतों और अन्य विभागों से ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली में लिप्तता के मामले सुनने को मिल रहे है ।ऐसे ही
कुछ लोग तो आरटीआई (सूचना का अधिकार) को हथियार बनाकर अधिकारियों और कर्मचारियों पर दबाव डालने और वसूली करने से भी नहीं चूकते।
“पत्रकार” लिखे वाहन इन फर्जी पत्रकारों के लिए ढाल बन गए हैं। इन्हीं वाहनों का उपयोग कर वे अवैध गतिविधियों को अंजाम देने में लगे रहते हैं। हैरानी की बात यह है कि जब ऐसे वाहन पुलिस के हत्थे चढ़ते भी हैं तो जांच को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार पुलिस पर भी ऐसे फर्जी पत्रकार दबाव बनाने में सफल हो जाते हैं।
इसके अलावा, कुछ कथित पत्रकार सरकारी अधिकारियों से साठगांठ कर चापलूसी के दम पर अपनी पहुँच बढ़ाते नजर आते हैं। पत्रकारिता का मंच उनके लिए महज एक स्वार्थसिद्धि का साधन बनकर रह गया है।
गौरतलब है कि रायसेन क्षेत्र में कुछ वर्ष पूर्व एक अवैध शिकार के मामले में “पत्रकार” लिखे वाहन पकड़े जा चुके हैं। हाल ही में इसी क्षेत्र में अवैध शराब से भरा ऐसा वाहन पुलिस द्वारा जब्त किया गया।
इस स्थिति में यह आवश्यक हो गया है कि “पत्रकार” लिखे वाहनों की सख्त और निष्पक्ष जांच की जाए। ऐसे लोग वाहनों पर प्रेस लिखवाकर जहां पत्रकारिता की छवि को बट्टा लगा रहे है वहीं जिन संस्थान से जुडे हो अथवा न जुडे हो उनकी साख को भी बट्टा लगाने से नही हिचकते हैं जिसका खामियाजा पत्रकारिता की छवि पर तो पडता ही है बल्कि प्रतिष्ठित प्रेस संस्थानो को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है इसके अलावा, ऐसी गतिविधियों में लिप्त कथित पत्रकारों के मामलों को संबंधित प्रेस संस्थाओं के संज्ञान में भी लाया जाए, ताकि वे अपने स्तर पर कार्रवाई कर सकें।
यह प्रयास आवश्यक है ताकि प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों की छवि सुरक्षित रहे और पत्रकारिता के सम्मान को बचाया जा सके।

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