अंधेर नगरी की तर्ज पर सांची जनपद पंचायत का हेरफेर चर्चित

नसीमखान
सांची। वैसे तो सांची जनपद पंचायत अंतर्गत 83 ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी सरकार ने सौंप रखी है, लेकिन यहां की भर्राशाही किसी से छिपी नहीं है। अधिकारियों की मनमानी और गड़बड़झाले लंबे समय से सुर्खियों में बने हुए हैं, जबकि शासन-प्रशासन छवि सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रहा। नतीजा यह है कि यहां पदस्थ अधिकारी खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने से परहेज़ नहीं करते।
वाहनों के नाम पर बड़ा खेल
जानकारी के अनुसार जनपद पंचायत सांची में वाहन नियमों को दरकिनार करते हुए पदस्थ अधिकारी दौरों और मीटिंग्स के नाम पर किराए के वाहन सुनिश्चित करते हैं। लेकिन, पहले से लगवाए गए वाहनों को अस्वीकार कर अपने मनपसंद वाहनों को किराए पर लगाकर सरकार को हजारों-लाखों रुपए का चूना लगाना आम बात हो चुकी है। यही नहीं, इन वाहनों का निजी उपयोग और अपडाउन तक सरकारी खाते से कराया जाता है। इस गड़बड़ी की शिकायतें समय-समय पर होती रही हैं, पर रसूख के चलते अधिकारी बच निकलते हैं।
पंचायतों में गड़बड़ी पर कार्रवाई नहीं
सांची जनपद पंचायत की 83 ग्राम पंचायतों में गड़बड़ियों के किस्से आम हैं। यहां सचिवों की संख्या 66 बताई जाती है, जबकि कई पंचायतों में रोजगार सहायक तक नहीं हैं। ऐसे में शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का जमीनी असर समझा जा सकता है। सचिवों की बैठकों में भी अनियमितताओं की चर्चाएं बनी रहती हैं, जिससे गरीब ग्रामीण लाभ पाने के बजाय दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
सरकारी संपत्ति अतिक्रमण की भेंट
जनपद पंचायत के अंतर्गत कई सरकारी भवन जर्जर और अतिक्रमण की चपेट में हैं, मगर अधिकारी चुप्पी साधे बैठे रहते हैं। नतीजतन, सरकारी संपत्ति दिन-प्रतिदिन अतिक्रमण की भेंट चढ़ती जा रही है।
मनरेगा में भारी गड़बड़ी
मनरेगा योजना का हाल और भी चौंकाने वाला है। यहां मशीनों से काम करवा कर जॉबकार्ड श्रमिकों के नाम पर भुगतान कर दिया जाता है। वहीं, तालाब और कुओं के नाम पर लाखों रुपए कागजों में खर्च दिखाए गए, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रही। इससे न केवल ग्रामीण रोजगार से वंचित हो रहे हैं बल्कि सरकारी राशि पर भी डाका डाला जा रहा है।
रसूख बचा लेता है जांच से
जानकार कहते है कि यदि सांची जनपद पंचायत की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच हो, तो बड़ा गड़बड़झाला उजागर होना तय है। हालांकि, अब तक हर शिकायत रसूखदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की सांठगांठ के चलते लीपापोती में दब जाती रही है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार का यह सिलसिला थमता नजर नहीं आता है।

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