नसीमखान सांची
सांची,,, विश्व धरोहर का गौरव समेटे ऐतिहासिक नगरी सांची 73वें महाबोधि महोत्सव के स्वागत में दुल्हन की तरह सजकर तैयार है। महाबोधि सोसायटी एवं प्रशासन ने समारोह की लगभग सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। नगर को आकर्षक रोशनी, बैनर और पोस्टरों से सँवारा गया है, वहीं स्तूप परिसर स्थित बौद्ध बिहार भी विशेष रूप से सजाया गया है।
समारोह में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं तथा प्रशासन ने सुविधाओं की व्यापक व्यवस्थाएं की हैं।
जानकारी के अनुसार सांची ढाई हजार वर्ष पुरानी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर समेटे हुए है। इसी समृद्ध विरासत को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रतिवर्ष महाबोधि महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें देश-विदेश से हजारों बौद्ध अनुयायी और पर्यटक शामिल होते हैं। इस बार 73वें महोत्सव की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
इस वर्ष के आयोजन में विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे—
महामहिम महिशिनि कालोन, भारत में श्रीलंका के उच्चायुक्त; मप्र सरकार में मंत्री प्रहलाद पटेल; पंचायत एवं ग्रामीण विकास तथा श्रम मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी; संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री; सांची विधायक डॉ. प्रभुराम चौधरी; जिला कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा; महाबोधि सोसायटी के पूज्य वानगल उपतिस्स नायक थैरो, चैत्यगिरि बिहार के अध्यक्ष तथा सांची-बिहार बौद्ध के वरिष्ठ भिक्षु सांची वानगल विमलतिस्स नायक थैरो उपस्थित रहेंगे।
सांची का ऐतिहासिक महत्व।
सांची के बौद्ध स्तूपों का निर्माण तीसरी सदी ईसा पूर्व से 12वीं सदी तक सम्राट अशोक द्वारा कराया गया। देखरेख के अभाव में ये स्तूप लंबे समय तक ध्वस्त अवस्था में रहे। अंग्रेजी शासन के दौरान 1712 से 1919 के बीच जनरल जॉनसन, जनरल कनिंघम, कैप्टन मेसी, भंडार कोल तथा सर जॉन मार्शल ने इनका सर्वेक्षण कर संरक्षण कार्य प्रारंभ किया।
साल 1951 में खुदाई के दौरान एक पत्थर की पेटी मिली, जिसमें भगवान बुद्ध के परम शिष्य सारिपुत्र और महामोद्गलायण की पवित्र अस्थियां प्राप्त हुईं। अंग्रेजी शासन के समय इन्हें अल्वर्ड विक्टोरिया म्यूजियम में सुरक्षित रखा गया था।
आजादी के बाद नवाब हमीदुल्ला बहादुर और प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रयासों से इन पावन अस्थियों को भारत वापस लाया गया। नवाब साहब ने बौद्ध मंदिर निर्माण के लिए भूमि और धनराशि उपलब्ध कराई। 1952 में मंदिर निर्माण पूर्ण होने के बाद पं. नेहरू स्वयं पवित्र अस्थियों को लेकर सांची पहुंचे। उस ऐतिहासिक अवसर पर देश के उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. शंकर दयाल शर्मा, सिक्किम के महाराजकुमार एवं कई देशों के राजदूत उपस्थित रहे।
अंतिम रविवार को ही क्यों होता है वार्षिकोत्सव?
जब पवित्र अस्थियां सांची लाई गई थीं, तब नवम्बर माह का अंतिम रविवार था। उसी दिन इन्हें नवनिर्मित मंदिर में विशेष पूजन के बाद जनता के दर्शनार्थ रखा गया। महाबोधि सोसायटी के तत्कालीन प्रमुख पूज्य एच.एच. प्रज्ञातिस्स थैरो के नेतृत्व में यह परंपरा शुरू हुई। तब से ही हर वर्ष नवंबर के अंतिम रविवार को विशेष पूजा-अर्चना और वार्षिकोत्सव आयोजित होता है।
प्राचीनकाल में सांची का नाम काकणाय।
इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन समय में सांची को ‘काकणाय’ के नाम से जाना जाता था। यहीं कलिंग युद्ध के समय सम्राट अशोक कुछ समय के लिए ठहरे थे। युद्ध में भारी जनहानि देखकर उन्होंने यहीं से अहिंसा और बौद्ध धर्म को अपनाने का निर्णय लिया और विश्व को शांति का संदेश दिया। इसी कारण सांची को ‘शांति का टापू’ भी कहा जाता है।
समारोह की अवधि में बदलाव।
यह 73वां वार्षिकोत्सव है। पहले यह कार्यक्रम एक दिवसीय होता था। बाद में पूर्व संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के कार्यकाल में इसे तीन दिवसीय कर दिया गया था, हालांकि हाल के वर्षों में इसे फिर से दो दिवसीय कर दिया गया है।
सांची की ऐतिहासिक धरोहर और बौद्ध संस्कृति की यह अनुपम विरासत एक बार फिर दुनियाभर के श्रद्धालुओं को शांति, आस्था और इतिहास से रूबरू कराने को तैयार है।






