महिला सशक्तिकरण और स्थानीय स्वशासन की भावना पर उठने लगे सवाल, प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाने की मांग

जनप्रतिनिधियों के स्थान पर प्रतिनिधियों का बढ़ता प्रभाव, क्या प्रभावित हो रही जनभागीदारी?

नसीमखान सांची
सांची,,
ग्राम पंचायतों से लेकर नगरीय निकायों तक इन दिनों एक ऐसी प्रवृत्ति चर्चा का विषय बनती दिखाई दे रही है, जिसमें निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जगह उनके परिजन, समर्थक अथवा अनौपचारिक प्रतिनिधि अधिक सक्रिय नजर आते हैं। स्थानीय स्तर पर इसे लेकर यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या इससे जनभागीदारी, विकास कार्यों की पारदर्शिता और जनप्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष भूमिका प्रभावित हो रही है।
जानकारों का मानना है कि शासन द्वारा महिलाओं सहित विभिन्न वर्गों को आरक्षण देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ाने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, जिला पंचायत और नगरीय निकायों में बड़ी संख्या में महिलाएं जनप्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित होकर सामने आई हैं। उद्देश्य यह रहा है कि वे निर्णय प्रक्रिया, प्रशासनिक संवाद और विकास योजनाओं के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाएं।
हालांकि स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा सामने आती रही है कि कुछ स्थानों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिजन या समर्थक प्रशासनिक गतिविधियों, बैठकों अथवा विभागीय समन्वय में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं। इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष भागीदारी सीमित होने की आशंका व्यक्त की जाती है।
विशेष रूप से महिला जनप्रतिनिधियों को लेकर यह मत भी सामने आता है कि यदि उन्हें प्रशासनिक प्रक्रियाओं और निर्णयों से सीधे जोड़ने के प्रयास मजबूत हों, तो नारी सशक्तिकरण के उद्देश्य को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की मूल भावना भी यही मानी जाती है कि निर्णय प्रक्रिया में निर्वाचित प्रतिनिधियों की सक्रिय और प्रत्यक्ष उपस्थिति बनी रहे।
हालांकि मंत्री, सांसद अथवा विधायक स्तर पर विधिसम्मत प्रतिनिधि नियुक्ति की व्यवस्था अलग प्रकृति की होती है, लेकिन स्थानीय निकायों और पंचायत स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को अधिक सक्रिय बनाने की आवश्यकता समय-समय पर महसूस की जाती रही है।
क्षेत्र में अब यह मांग भी उठने लगी है कि जनप्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष सहभागिता बढ़ाने, प्रशिक्षण और प्रशासनिक संवाद को मजबूत करने की दिशा में और प्रभावी प्रयास किए जाएं, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य और अधिक सार्थक रूप से पूरा हो सके।
लोकतंत्र की मजबूती प्रतिनिधित्व से नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी से अधिक प्रभावी बनती है।

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