जिले में आजीविका की ओर बढ़ते महिलाओं के कदमआजीविका मिशन से जुड़कर मजदूर से मालिक बनीं महिलाएं


सियरमऊ में स्थापित सिलाई सेन्टर से लगभग 300 महिलाओं को मिल रहा रोजगार

नसीम खान

रायसेन,
रायसेन जिले के सिलवानी विकासखण्ड मुख्यालय से लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित सियरमऊ ग्राम पंचायत में भरण-पोषण के लिए मजदूरी करने को मजबूर महिलाओं को ग्रामीण आजीविका मिशन द्वारा स्वाबलंबी बनाने के लिए वर्ष 2018 में बूमन टेलर (सिलाई) का निःशुल्क प्रशिक्षण देकर एक छोटा सा प्रयास किया गया। जो अब वट वृक्ष का रूप ले रहा है। आज यह सिलाई सेंटर सियरमऊ की 35 से 40 महिलाओं के लिए आजीविका का स्थाई साधन तो बना ही है, साथ ही क्षेत्र के 14 गॉवों की लगभग 300 से अधिक महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ रहा है। सिलाई सेंटर में 32 सिलाई मशीन सिंगल निडिल, एक काज मशीन, एक बटन मशीन, एक इलासिटक मशीन, दो फ्लेट लाक मशीन, 06 ओवर लाक मशीन, एक साइउ मुन्डा शर्ट मशीन, 05 कटिंग मशीन, 02 इंटर लाक मशीन हैं। आजीविका मिशन द्वारा सियरमऊ में सर्वप्रथम महिलाओं को सर्वप्रथम लगभग 85 महिलाओं को ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (त्ैम्ज्प्) के माध्यम से बूमन टेलर का निःशुल्क प्रशिक्षण दिलवाया गया। प्रशिक्षण के पश्चात महिलाओं को एक छत के नीचे सामूहिक रूप से कार्य करने की जरूरत महसूस की गई जिसको ध्यान में रखते हुए बैंक के माध्यम से 26 महिलाओं को आर्थिक कल्याण योजना के अंतर्गत पंजाब नैशनल बैंक की सिलवानी शाखा से प्रति महिला 30 हजार रू ऋण उपलब्ध करवाया गया। जिससे महिलाओं ने मिलकर आधुनिक मशीनों से युक्त एक सिलाई कारखाने (केन्द्र) की शुरूआत की। महिलाओं को शुरूआती दौर में विभिन्न समस्याओं से भी जूझना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे यह महिलाएं सिलाई कार्य में निपुण होती गईं और अपने व्यवसाय से लाभ अर्जित कर इनके द्वारा बैंक का ऋण चूकता कर दिया गया है। इन महिलाओं द्वारा और अधिक अत्याधुनिक सिलाई मशीनें क्रय कर वर्तमान में अपने स्तर पर सीधे मिलों से कपडा क्रय कर स्कूली बच्चों की गणवेश सिलाई के साथ ही विभिन्न प्रकार के कार्य जैसे तिरंगा झंडा निर्माण, कोविड काल में मास्क निर्माण, पेटीकोट नेकर, लैगी, प्लाजो आदि का निर्माण कर स्थानीय बाजारों में एवं ऑनलाईन मार्केटिंग कर विक्रय करने का कार्य किया जा रहा है। जिससे महिलाओं को लगभग 10 से 12 हजार रू प्रतिमाह आय हो रही है। यह सेन्टर वर्तमान में 35 से 40 महिलाओं के लिए एक स्थाई रोजगार का साधन बन गया है। अभी तक महिलाओं द्वारा 128000 स्कूली बच्चों की गणवेश तैयार की गई है, जिसमें 20 रुपये प्रति गणवेश का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ है। आज इन महिलाओं ने स्वयं आत्मनिर्भर बनने के साथ ही लगभग 14 गॉवों की 300 से अधिक बहनों को भी सेन्टर में जोड़कर सिलाई का काम दिया है। यह बहनें सेन्टर से कपडे ले जा कर सिलकर वापस सेन्टर में जमा करती है तथा जो उनकी सिलाई की राशि उन्हे प्राप्त हो जाती है। इस आमदानी से महिलाएं अपने घर पर भी आधुनिक सिलाई मशीन क्रय कर स्थानीय स्तर पर रोजगार प्राप्त कर रही है और आत्म निर्भर होकर खुशहाल जिंदगी जी रही है। यह सेन्टर सियरमऊ के साथ ही अन्य गाँव की समूह की दीदीयों के लिए भी आजीविका का मुख्य साधन बन गया है।

सिलाई सेन्टर से बनी लखपति दीदीसिलवानी की सियरमऊ की महिलाओं ने जब से अपनी आजीविका के रूप में सिलाई को अपनाया है तभी से उनका और उनके परिवार पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। सिलाई से प्राप्त आमदानी से समूह की दीदीओं के बच्चे अब अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं। दीदी रेखा नामदेव ने बताया कि सिलाई से पहले हम लोग मजदूरी कर रहें थें, परन्तु समूह से जुड़ने के बाद तथा इस सिलाई सेन्टर के बनने के फलस्वरूप हमारी आमदानी बढ़ी है और जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है। अब परिवार की आर्थिक उन्नति में हमारा भी योगदान है, जिससे मान-सम्मान भी बढ़ा है। इसी प्रकार रजनी दीदी ने बताया कि इस सेन्टर ने हमें मजदूर से मालिक बना दिया है। मजदूर से मालिक बनने की इस यात्रा में कई समस्याएं आई परन्तु आजीविका मिशन के अधिकारियो-कर्मचारियों के सहयोग एवं हमारी दृढ इच्छाशक्ति और मेहनत का नतीजा है कि हमने इस सेन्टर को और इस सेन्टर ने हमें आज इस मुकाम तक पहुंचाया। रजनी सेन्टर के शुरू होने से पहले के अपने जीवन के संघर्ष को याद करते हुए कहती हैं कि आजीविका मिशन हमारे जीवन में वरदान के रूप में आया है और इस वरदान का ही नतीजा है कि आज 14 गाँव की बहनें देश के प्रधानमंत्री नरेनद्र मोदी जी की कार्य योजना में लखपति दीदी में शामिल हो गई। अब इसको और अधिक बढ़ाने के लिए आजीविका मिशन और शासन के सहयोग से कार्य कर रही है। शानु खरे ने बताया कि हमारे सेन्टर का भ्रमण करने के लिए कई जिलों एवं ब्लाकों के साथ-साथ भोपाल से भी अधिकारी समय-समय पर आए हैं। जब वह सेन्टर देखते है तो इतनी छोटी जगह पर इतना बड़ा प्रयास देख कर हमारा मनोबल बढ़ाते हैं और कहते है कि इसको और आगे ले जाना है। आपका और आजीविका मिशन का प्रयास बहुत ही सराहनीय है। हमारे यहाँ एक-एक बहन 10 से 12 हजार रुपये माह के आमदानी कर लेती है, जो उनकी आजीविका का साधन है। इससे परिवार की आर्थिक उन्नति हो रही है और मान-सम्मान भी बढ़ रहा है।

अब सीधे फैक्ट्री से खरीदती हैं कच्चा मालपहले स्कूली बच्चों की गणवेश एवं अन्य उत्पादों को तैयार करने के लिए कच्चे माल (कपडा व अन्य सहायक सामग्री) को पहले व्यापारियों से क्रय किया जाता था, जिसकी कीमत ज्यादा चुकानी पडती थी। इसको कम करने के लिए आजीविका रूरल मार्ट के नाम से महिलाओं की एक पार्टनरशिप फर्म का सी.ए. के माध्यम से रजिस्ट्रेशन करवाया गया। रजिस्ट्रेशन के पश्चात आज यह महिलाऐं सीधे मिल (फैक्ट्री) से शासन द्वारा निर्धारित किए गए मानक अनुसार आर्डर पर कपड़ा बनवा रहीं हैं और अपने समूहों को सप्लाई कर रही है। जिससे जो लाभ व्यापारियों द्वारा लिया जाता था वह लाभ अब सीधे महिलाओं की फर्म को हो रहा है। इस लाभ से महिलाओं को भविष्य में दूसरी गतिविधियों की शुरूआत करने में कठिनाई नहीं होगी। मासिक (GST) रिटर्न भरने के लिए भोपाल की चार्टड एकाउन्टेन्ट फर्म को नियुक्त किया गया है।

भविष्य की योजनास्कूली बच्चों की ड्रेस बनाकर यह महिलाएं सिलाई कार्य में दक्ष हो गई है इसको देखते हुए रिलाइंस फाउन्डेशन मुम्बई के सदस्यों ने सेन्टर की विजिट की ओर सहयोग के लिए हाथ बढाया है। शुरूआत में यह फाउन्डेशन 21 दिन का प्रशिक्षण आयोजित करेगा जिसमें फेन्सी लेडीज एवं जेन्ट्स कुर्ते बनाने एवं बेंचने में इन महिलाओं का सहयोग करेगा। इसके साथ-साथ भविष्य में और अधिक व्यापक स्तर पर रेडिमेड गारमेन्ट्स तैयार कर स्थानीय बाजार के साथ-साथ ऑनलाइन मार्केट में उत्पाद बेचने की योजना है। कलेक्टर श्री अरविंद दुबे ने बताया कि जिले में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आजीविका मिशन और स्व-सहायता समूहों से जोड़कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। महिलाओं को रोजगारमूलक प्रशिक्षण दिलाने के साथ ही रोजगार स्थापित करने हेतु उन्हें बैंकों के माध्यम से ऋण भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इन महिलाओं द्वारा बनाए जा रहे उत्पादों, सामग्रियों को भी बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में भी किया जा रहा है। जिले की अनेक महिलाओं ने आजीविका मिशन से जुड़कर प्रदेश में सफल उद्यमी की पहचान बनाई है।

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