नसीमखान
सांची,,
विश्व धरोहर स्थल सांची, जिसकी ऐतिहासिक पहचान ढाई हजार वर्ष पुरानी है, आज अतिक्रमण की मार झेल रहा है। पर्यटन विकास को लेकर बड़ी-बड़ी घोषणाएँ भले ही की जाती रही हों, लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का सिलसिला लगातार जारी है और प्रशासन इसके सामने पूरी तरह नतमस्तक दिखाई देता है।
जानकारी के अनुसार सांची को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। यहाँ दुर्लभ धातुओं और प्रतिमाओं का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के जिम्मे है। साथ ही नगर परिषद गठन कर शासन ने इसके सुनियोजित विकास का बीड़ा भी उठाया था। किंतु वास्तविकता यह है कि यहाँ कभी बड़ी मात्रा में मौजूद रही सरकारी भूमि अब अतिक्रमणकारियों के कब्जे में जा चुकी है।
देखरेख के अभाव और अधिकारियों की अनदेखी से स्थिति यह हो गई है कि बेशकीमती राजस्व भूमि ही नहीं, बल्कि मुख्य सड़कों तक पर अतिक्रमण हावी है। नतीजतन चौड़ी सड़कें गलियों का रूप ले चुकी हैं।
अतिक्रमण करने वालों में गरीब तबका ही नहीं, बल्कि संपन्न प्रभावी रसूखदार, सहित शासकीय अधिकारी और प्रभावशाली लोग भी शामिल बताए जाते हैं। यही कारण है कि न प्रशासन और न ही शासन, कोई भी कार्रवाई करने का साहस ही जुटा पाया। जिससे लगता है जिम्मैदारो की लिप्तता से इंकार नहीं किया जा सकता ।जिससे
इस लापरवाही का खामियाजा आम नागरिकों को तो भुगतना ही पड़ रहा है, साथ ही इस विश्वविख्यात स्थल की छवि भी देश-विदेश में धूमिल हो रही है। अन्य शहरों में जहाँ समय-समय पर अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई होती रहती है, वहीं सांची में चुप्पी पर सवाल खड़े कर रहे है।
स्थानीय लोग अब प्रशासन से अपेक्षा कर रहे हैं कि अतिक्रमणकारियों से भूमि मुक्त कराई जाए, ताकि इस धरोहर का विकास संभव हो सके और अधिक से अधिक देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ आकर्षित हों। इससे न केवल नगर की छवि निखरेगी बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त होंगे।






