जनकल्याणकारी योजनाए चलने के बाद भी पन्नी बीनने पर मजबूर महिलाएं ।

नसीमखान सांची
सांची,,, गरीबों के लिए केंद्र राज्य सरकारें जनकल्याण कारी योजना को धरातल पर पहुंचा रही हैं तथा हर हालत में लाभ पहुंचाने की जुगत भिडाने जुटी हुई है बावजूद इसके महिलाओं बच्चों का पन्नी बीनने का सिलसिला बदस्तूर जारी है इससे न केवल सरकार की छवि बल्कि देश की छवि पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है पन्नी बीनने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले पा रहा है।
जानकारी के अनुसार इस विश्व ऐतिहासिक स्थल सहित क्षेत्र में केंद्र एवं राज्य सरकारें गरीब महिला बच्चों के लिए सैकड़ों जनकल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित कर रही हैं जिससे गरीब परिवारों को लाभ पहुंच सके ।सरकारें भवन विहीन लोगों को आवास योजना चलाकर लाभ पहुंचाने की कवायद में जुटी हुई है इसके साथ ही गरीबो को निशुल्क अनाज वितरण कर तथा विभिन्न पेंशन सहित हर संभव प्रयास में जुटी हुई है बावजूद इसके तब सरकार व योजनाओं के चलने के बाद भी आखिर कार गरीब लोग अपने बच्चों सहित महिलाएं पन्नी बीनकर तथा गंदगी के बीच विभिन्न बीमारियों की परवाह किए बगैर आखिर कार यह व्यवसाय को करने क्यों मजबूर हो रहे है कहा नहीं जा सकता है ।जबकि सरकारें हर व्यक्ति को स्वस्थ रखने स्वच्छता अभियान जैसे अनेक योजना चला रही हैं बावजूद इसके क्षेत्र भर में महिलाएं बच्चे जिनकी उम्र खेलने कूदने शिक्षा पाने स्कूलों में जाने की होती हैं तब महिलाएं आसानी से गंदगी से रोजगार तलाशती दिखाई देती हैं जबकि सरकार ने महिलाओं के लिए अनेक योजना चला रखी हैं इसके साथ साथ विभिन्न महिलासमूहों के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने की की योजना भी बना डाली ।बावजूद इसके या तो इन महिलाओं को जागरूक नहीं किया जा सका अथवा समूहों का लाभ इन महिलाओं तक नहीं पहुंच सका ।जिस कारण इन महिलाओं की सरकारी योजनाओं से दूरी के कारण इन्हें अपना जीवन यापन करने गंदगी कचरों से रोटी की जुगत भिडाने पर मजबूर होना पड रहा है ।इससे न केवल सरकार की छवि खराब हो रही हैं बल्कि इस नगर में देश विदेश से आने जाने वाले लोगों के केमरो मे भी इनका जीवन कैद हो रहा है जिससे जनकल्याणकारी योजनाओं पर भी सवाल खड़े हो रहे है ।यही हाल उन मासूम बच्चों का भी बना हुआ है जिन्हें सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से निशुल्क शिक्षा निशुल्क भोजन निशुल्क खेलकूद मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध कराये गए बावजूद इसके यह बच्चे भी कचरों गंदगी मे रोटी तलाश करते दिखाई देते है जिनके कंधों पर स्कूल की किताबें बस्ते हो तब उनके कंधों पर पन्नी बीनने की बोरी टंगी दिखाई देती हैं इन बच्चों से शिक्षा भी कोसों दूर दिखाई देती हैं आखिर सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सम्हालने वाले लोगों की नजरों से यह महिला बच्चे ओझल क्यों दिखाई देते है इतना ही नहीं इन बच्चों की देखरेख करने वाले बाल संरक्षण आयोग की भी नजर न पहुंच पाना कहीं न कहीं सवाल खड़े करते हैं ।इस पूरे मामले से जहां सरकार की छवि खराब होती हैं तो दूसरी ओर ऐसे विख्यात स्थलो की भी छवि खराब हो जाती हैं ।इस ओर प्रशासन को गंभीरता से विचार करने की जरुरत मेहसूस की जा रही हैं जिससे यह महिला बच्चे गंदगी से बच सके तथा विभिन्न बीमारी की जद मे न पहुंच पाये ।

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