शुरू से बौद्ध वार्षिकोत्सव के अंतिम रविवार की टूटी परंपरा ।प्रचार प्रसार के अभाव में अंतिम रविवार को उमडा जनसैलाव ।

नसीमखान
सांची,,,सांंची एक विश्व विख्यात पर्यटक स्थल माना जाता है इस स्थल का इतिहास लगभग ढाई हजार साल प्राचीन है तथा इस स्थल से खुदाई में अंग्रेजों के हाथ भगवान बुद्ध के परम शिष्यों की पवित्र आस्थियो को लेकर इंग्लैंड पहुंचा दिया था तथा देश की आजादी के बाद भारत सरकार के अथक प्रयास से इन आस्थियो को वापस लाया गया तथा उस समय स्तूप पहाड़ी पर निर्मित बौद्ध मंदिर में देश के पहले प्रधानमंत्री ने पूजा अर्चना कर पवित्र आस्थियो को जनता के दर्शनार्थ रखा गया था वह दिन नवंबर माह का अंतिम रविवार था तबसे अबतक नवंबर माह के अंतिम रविवार को ही बौद्ध वार्षिकोत्सव मनाया जाने लगा ।यह परंपरा लगभग इस वर्ष 72 साल में टूट गई तथा इस वर्ष बौद्ध वार्षिकोत्सव 30नवंबर एवं 1 दिसंबर को महाबोधि सोसायटी द्वारा कर दी गई ।तथा इस बौद्ध वार्षिकोत्सव की बदलाव की जानकारी के अभाव में देश विदेश के पर्यटकों का जनसैलाव उमड पडा ।इस स्थिति में बौद्ध वार्षिकोत्सव की व्यवस्था को लेकर नियुक्त किए गए एसडीएम स्वयं स्तूप परिसर में उपस्थित रहे।
जानकारी के अनुसार जब ढाई हजार साल प्राचीन विश्व ऐतिहासिक बौद्ध स्मारको की अंग्रेज अफसरों ने खुदाई की तब स्मारको के भीतरी क्षेत्र से एक पत्थर की पेटी निकली थी तथा उसमे से भगवान बुद्ध के परम शिष्यों सारिपुत्र महामोदग्लाइन की पवित्र अस्थियां पाई गई थी जिन्हें अंग्रेज अफसरों द्वारा इंग्लैंड लेजाकर वहां अजायबघर मे रखा गया था ।इसके बाद देश आजाद हुआ तथा देश की बागडोर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संभाली तथा यहां से लेजाई गई पवित्र अस्थियों को वापस लाने भारत सरकार ने प्रयास शुरू किये तथा अस्थियों की वापस लाने एवं उन्हें सुरक्षित रखने के लिए भारत सरकार एवं उस समय नवाब भोपाल ने स्तूप पहाड़ी पर बौद्ध मंदिर निर्माण हेतु भूमि उपलब्ध कराते हुए मंदिर निर्माण के लिए 25 हजार रुपए की राशि भोपाल रियासत से प्रदान की गई तब इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कराया गया एवं दो वर्ष में बौद्ध मंदिर निर्मित हुआ तब पवित्र अस्थियों को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू स्वयं विशेष ट्रेन से लेकर सांंची पहुंचे थे तब अनेक देशों के राजनयिकों एवं देश के उपराष्ट्रपति सहित अनेक राजनयिकों ने पवित्र आस्थियो की रेलवे स्टेशन पर अगवानी की तथा उन्हें सम्मान के साथ लेकर बौद्ध मंदिर पहुंचाया गया ।इसके साथ ही पंडित नेहरू ने भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पावन अस्थियों की पूजा अर्चना कर जनता के दर्शनार्थ रखा गया था तब देश विदेश से पहुंचे बौद्ध अनुयायियों एवं पर्यटकों ने पावन आस्थियो के दर्शन किये इसके उपरांत इन पावन अस्थियों को स्तूपों की परिक्रमा कराने के उपरांत बौद्ध मंदिर में निर्मित तहखाने में सुरक्षित रखी गई थी ।प्रथम पूजा का दिन नवंबर माह का अंतिम रविवार था तबसे ही हरवर्ष नवंबर माह के अंतिम रविवार को बौद्ध वार्षिकोत्सव का आयोजन शुरू किया गया तथा इस प्रकार हर वर्ष हजारों की संख्या में देश विदेश से बौद्ध अनुयायियों के साथ देशभर से लाखों की संख्या में जनसैलाव उमडऩे लगा तथा लोग पवित्र अस्थियों के दर्शन करने आते रहे ।इस अवसर पर भारी सुरक्षा व्यवस्था की जाने लगी तथा इन पवित्र आस्थियो की नवंबर के अंतिम रविवार को बौद्ध वार्षिकोत्सव मनाया जाने लगा ।यह परंपरा लगभग 70 वर्ष से चली आ रही थी परंतु इस वर्ष महाबोधि सोसायटी द्वारा इस वर्ष इस परंपरा को खत्म करते हुए 30 नवंबर एवं 1 दिसंबर निश्चित कर दिया गया इस अवसर पर इस आयोजन को लेकर भारी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है तथा जिला प्रशासन इसमे व्यवस्था जुटाने क ई दिन पहले से तैयारी में जुट जाता है इस आयोजन में अनेक देश विदेश से विशिष्ट अतिविशिष्ट व्यक्ति शामिल होने पहुचते हैं नवीन जानकारी के अभाव में नवंबर माह के अंतिम रविवार होने के कारण आज भारी जनसैलाव उमड पडा तथा स्तूप परिसर वाहनों से खचाखच भर गया तथा मुख्य चौराहे तक वाहनों की कतारें लगी रही ।रविवार की जानकारी होने के कारण लोग परेशानी उठाते दिखाई दिये यहां तक कि आयोजन के दौरान एक दिन के लिए स्तूपों के दर्शनार्थ पुरातत्व विभाग निशुल्क कर देता है परंतु आज पुरातत्व विभाग के टिकट की खासी बिक्री होने से आय भी खासी हो गई ।तथा यहां आने वाली ट्रेन बसों को भी खचाखच भरा हुआ देखा गया बिना आयोजन के हजारों लोगों का मेला लगा रहा इतना ही नहीं अनेक दुकानदारों ने भी अपनी दुकान लगाकर खूब कमाई की ।जैसे ही जिला प्रशासन को भनक लगी तो यहां होने वाले आयोजन मे नोडल अधिकारी के रूप में एसडीएम मुकेश सिंह को नियत किया गया था ।वह तत्काल यहां पहुंच गए एवं उन्होंने व्यवस्था का जायजा लिया ।तथा एसडीएम श्री सिंह देर शाम तक स्वयं व्यवस्था देखते रहे ।परन्तु पुरातत्व विभाग अचानक बढी भीड से बेखबर बना रहा तथा स्तूप परिसर में लोग पानी के लिए भी भटकते दिखाई दिये ।

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