नसीमखान सांची
सांची,,,
विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक पर्यटन स्थल सांची को सुंदर और विकसित बनाने के नाम पर अनुमानित तौर पर लाखों–करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन इसी तथाकथित विकास की सबसे बड़ी कीमत यहां की हरियाली को चुकानी पड़ रही है। कभी चारों ओर हरियाली से आच्छादित रहने वाला यह क्षेत्र आज पेड़ों की अनदेखी और संरक्षण के अभाव में सूखने की कगार पर पहुंच गया है।
स्थानीय नागरिकों के अनुसार सांची एक समय केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए ही नहीं, बल्कि शुद्ध ऑक्सीजन देने वाले घने, छायादार और फलदार वृक्षों के लिए भी जानी जाती थी। यही हरियाली देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती थी, जिसके चलते पर्यटक कई दिनों तक यहां ठहरकर इस स्थल की ऐतिहासिकता और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते थे।
समय के साथ सांची को और अधिक आकर्षक बनाने की कवायद तेज हुई। सरकारों ने इसे पर्यटन के लिहाज से विकसित करने के उद्देश्य से भारी भरकम राशि स्वीकृत की, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद न तो अपेक्षित सौंदर्य विकास दिखाई दिया और न ही हरियाली का संरक्षण किया जा सका।
एक समय लगभग 11 एकड़ में फैला शासकीय उद्यान सदैव हराभरा रहता था। यहां मौजूद फलदार और छायादार वृक्ष न केवल शुद्ध ऑक्सीजन देते थे, बल्कि छाया और फल के कारण नगरवासियों व पर्यटकों को बड़ी राहत मिलती थी। नगर की सड़कों के किनारे लगे बड़े-बड़े पेड़ भी लोगों को धूप से बचाते थे, लेकिन विकास और सुंदरता के नाम पर जहां एक ओर बड़ी राशि खर्च हुई, वहीं दूसरी ओर इन हरे-भरे पेड़ों का भी सफाया कर दिया गया।
राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के दौरान सड़क किनारे लगे छोटे-बड़े पेड़ों को भी काटा गया। लोगों के विरोध के बाद निर्माण एजेंसी द्वारा पुनः पौधारोपण का आश्वासन दिया गया, लेकिन वह भी धरातल पर प्रभावी साबित नहीं हुआ। शासकीय उद्यान का लगभग आधा हिस्सा पर्यटन विभाग को सौंपा गया, जहां पहले फलदार और छायादार वृक्ष मौजूद थे, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही और नियमित देखरेख के अभाव में कई पेड़ नष्ट हो गए और जो शेष बचे हैं, वे भी धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं।
नगर में चर्चा है कि सांची को सुंदर बनाने के नाम पर किए गए अधिकांश प्रयास केवल कागजों और फाइलों तक सीमित रह गए हैं। पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि पर्यटकों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी, बल्कि गिरावट देखने को मिल रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो यह स्थल विभागीय कमाई का जरिया बनकर रह जाएगा।
हालांकि विभागीय स्तर पर समय-समय पर पौधारोपण और संरक्षण के दावे किए जाते हैं, लेकिन उनका असर जमीन पर नजर नहीं आता। ऐसे में यह आशंका गहराने लगी है कि विकास की इसी तर्ज पर कहीं सांची अपनी ऐतिहासिक पहचान के साथ-साथ प्राकृतिक विरासत भी न खो बैठे।
यदि विकास के नाम पर हरियाली यूं ही मिटती रही, तो सांची की पहचान इतिहास के साथ-साथ प्रकृति से भी कटती चली जाएगी।






