नसीमखान सांची
सांची,,, वैसे तो इस नगर को ऐतिहासिक स्थल का दर्जा प्राप्त है इस स्थल के विकास का जिम्मा भी नगर परिषद के कांधे पर रहता है परन्तु यहां अधिकांश सीएमओ के रूप में कमान प्रभारियों के हाथों में सौंप दी जाती हैं तथा जब तक इस नगर की स्थिति से रुबरु होता है तब तक बोरिया बिस्तर समेटने के आदेश मिल जाते है जिससे इस स्थल पर नवागत सीएमओ को इससे रुबरु होने मे समय लगाना पडता है ।
जानकारी के अनुसार वैसे तो यह स्थल अपने आप मे ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख माना जाता है परन्तु इस स्थल की कमान अधिकांश प्रभारियों को सौंप दी जाती हैं वर्तमान में पदस्थ सीएमओ अशोक वर्मा को प्रभारी सीएमओ के रूप में पदस्थ किया गया था तथा कुछ ही महीने गुजरे थे कि फिर दूसरे प्रभारी सीएमओ के पदस्थापना की चर्चा चल पडी हैं तथा श्री वर्मा का स्थानांतरण की चर्चा चल पडी हैं ।जबजब इस परिषद में सीएमओ की पदस्थापना होती है तब वह इस विख्यात स्थल की भौगोलिक स्थिति समझ पाते एवं सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर उतारने अपने स्तर पर प्रयास करते तब तक शासन सीएमओ का स्थानांतरण कर दूसरे सीएमओ की पदस्थापना कर देता है इस दशा में जब नवागत सीएमओ प्रभार सम्हालते हैं तब नये सिरे से नगर की भोगोलिक स्थिति एवं विकास के साथ ही शासन की विभिन्न योजना एवं जनसमस्याओं के निराकरण हेतु पुनः स्थिति समझने में समय बर्बाद होता है जबकि एक सीएमओ को कमसे कम तीन वर्ष का कार्यकाल का समय दिया जाना चाहिए ।बार बार स्थानांतरित होने से शासन की विभिन्न योजनाए प्रभावित होती हैं इसके साथ ही जनसमस्याओं का भार भी प्रशासन पर बढ जाता है ।जबकि इस ऐतिहासिक स्थल की नगर परिषद में कर्मचारियों का जमघट वर्षों से जमा हुआ है इनमें अनेक कर्मचारी ऐसे भी दिखाई देते है जिनकी पदस्थापना भी इसी परिषद में की गई थी तथा सेवा निवृत की संभावना भी इसी परिषद से हो सकती है जिनकी कार्यप्रणाली भी समय समय पर चर्चित होती रही हैं परन्तु शासन इन जड जमाये बैठे कर्मचारियों की जडें नहीं हिला सका ।इतना ही नहीं इन जड जमाये बैठे कर्मचारियों की राजनीति में भी खासी पकड़ बताई जाती हैं ।समय समय पर जनता को भी अपनी जनसमस्याओं के लिए इधर उधर भटकने का खामियाजा भुगतना पड़ता है ।परन्तु न तो शासन न ही प्रशासन इन कर्मचारियों को इधर से उधर करने की हिम्मत जुटा सका है ।






