भोजपुर का शिव मंदिर, अपनी भव्यता के लिए देशभर में है प्रसिद्धमहाशिवरात्रि पर्व पर आयोजित होता है तीन दिवसीय भोजपुर महोत्सव

नसीमखान सांची, रायसेन

रायसेन,
रायसेन जिले में भोजपुर स्थित प्राचीन भोजेश्वर शिव मंदिर अपनी भव्यता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। भोजपुर शिव मंदिर की बात ही मन में अपार श्रद्धा का प्रादुभाव कर देती है। भोजपुर मंदिर दुनिया में विशाल शिवलिंग वाले मंदिरों में अग्रणी है। भक्तों की आस्था के इस केन्द्र में भगवान शिव की पूजा अर्चना करने का ढंग भी बिल्कुल अनोखा है। शिवलिंग इतना बड़ा है कि उसका अभिषेक धरती पर खड़े होकर नहीं किया जा सकता। अंदर विशालकाय शिवलिंग के कारण इतनी जगह नहीं बचती कि किसी अन्य तरीके से शिवलिंग का पूजन किया जा सके इसलिए हमेशा से ही इस शिवलिंग का अभिषेक और पूजन इसकी जलहरी पर चढ़कर ही किया जाता है।

साल में दो बार आयोजित होता है मेला

इस प्रसिद्ध स्थल में वर्ष में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है जो मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय होता है। महाशिवरात्रि पर यहां तीन दिवसीय भोजपुर महोत्सव का भी आयोजन होता है। इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए दूर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। रायसेन जिले में स्थित भोजपुर मंदिर देश के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक है। एक पहाड़ी पर बना हुआ यह शिव मंदिर भोजपुर शिव मंदिर और भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण परमार वंश के राजा भोज ने कराया था। इस मंदिर की विशेषता है कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 18 फीट है जो कि देश के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है। इस शिवलिंग का निर्माण सिर्फ एक ही पत्थर से किया गया है जिसके कारण यह विश्व का एक मात्र ऐसा शिवलिंग है।

इतिहासकार कहते हैं कि भोजपुर तथा इस शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज प्रथम (1010 ई – 1055 ई) द्वारा कराया गया था। कांक्रीट के जंगलों को पीछे छोड़ प्रकृति की हरी भरी गोद में, बेतवा नदी के किनारे बना उच्च कोटि की वास्तुकला का यह नमूना राजा भोज के वास्तुविदों के सहयोग से तैयार हुआ था। इस मंदिर की विशेषता इसका विशाल शिवलिंग हैं जो कि विश्व का एक ही पत्थर से निर्मित सबसे बड़ा शिवलिंग हैं। सम्पूर्ण शिवलिंग कि लम्बाई 5.5 मीटर (18 फीट ), व्यास 2.3 मीटर (7.5 फीट ) तथा केवल शिवलिंग की लम्बाई 3.85 मीटर (12 फीट) है।

पाण्डवों द्वारा निर्माण किए जाने की है मान्यता

इस मंदिर को पांडवकालीन भी माना जाता है। कहा जाता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान वे भोपाल के नजदीक भीमबेटका में भी कुछ समय के लिए निवासरत थे। इसी समय में उन्होंने माता कुन्ती की पूजा के लिए एक भव्य शिव मंदिर का निर्माण किया था। इस मंदिर को बड़े बड़े पत्थरों से स्वयं भीम ने तैयार किया था। ताकि पास ही बहने वाली बेतवा नही में स्नान के बाद माता कुन्ती भगवान शिव की उपासना कर सकें। कहा जाता है कि कालान्तर में यही विशाल शिवलिंग वाला मन्दिर बाद में राजा भोज के समय विकसित होकर भोजेश्वर महादेव मंदिर कहलाया। भोजेश्वर मंदिर के पीछे के भाग में बना ढलान है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था।

पूरे विश्व में कहीं भी अवयवों को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक उपलब्ध नहीं है। ये एक प्रमाण के तौर पर है, जिससे ये रहस्य खुल जाता है कि आखिर कैसे कई टन भार वाले विशाल पत्थरों का मंदिर के शीर्ष तक पहुचाया गया। इतिहासकारों एवं पुरातत्विदों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्वान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत भी मानते हैं।

इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है। इस मंदिर की विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ भी हैं। इसके अतिरिक्त भूविन्यास, सतम्भ, शिखर, कलश और चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण नहीं किए हुए हैं। भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है।

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